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नियमसार गाथा ८८ अब इस गाथा में यह कहते हैं कि त्रिगुप्तिधारी साधु ही प्रतिक्रमण हैं; क्योंकि वे प्रतिक्रमणमय हैं । गाथा मूलतः इसप्रकार है -
चत्ता अगुत्तिभावं तिगुत्तिगुत्तो हवेइ जो साहू। सो पडिकमणं उच्चइ पडिकमणमओ हवे जम्हा ।।८८ ॥
(हरिगीत ) तज अगुप्तिभाव जो नित गुप्त गुप्ती में रहें।
प्रतिक्रमणमय है इसलिए प्रतिक्रमण कहते हैं उन्हें।।८८|| जो साधु अगुप्तिभाव को छोड़कर त्रिगुप्ति में गुप्त रहते हैं; वे साधु प्रतिक्रमण कहे जाते हैं; क्योंकि वे प्रतिक्रमणमय ही हैं।
इस गाथा के भाव को टीकाकार मुनिराज इसप्रकार स्पष्ट करते हैं
“त्रिगुप्तिगुप्त लक्षणवाले परमतपोधन सन्तों को निश्चयचारित्र होने का यह कथन है। ___ परमतपश्चरणरूपी सरोवर के कमलसमूह को खिलाने के लिए जो प्रचंड सूर्य समान हैं; ऐसे अति आसन्नभव्य मुनीश्वर; बाह्य प्रपंचरूप अगुप्तिभाव छोड़कर, त्रिगुप्तिरूप निर्विकल्प परमसमाधिलक्षण से लक्षित अति-अपूर्व आत्मा को ध्याते हैं, वे मुनिराज प्रतिक्रमणमय परमसंयमी होने से निश्चय प्रतिक्रमणस्वरूप ही हैं।" __ इस गाथा के भाव को स्वामीजी इसप्रकार स्पष्ट करते हैं - ___“मन-वचन-काय के लक्ष्य से होनेवाले शुभाशुभभाव अगुप्तभाव हैं। पाँच महाव्रत के भाव अगुप्तभाव हैं, उनको छोड़कर शुद्धचैतन्य में आना, वह गुप्तिभाव है, धर्मभाव है। स्वभाव में से बाहर निकलना, वह संसारभाव हैं । जो अपने स्वभाव में गुप्त रहता है - ऐसे परमतपरूपी लक्ष्मी के स्वामी मुनि को निश्चयचारित्र होने का कथन है।'
प्रतिक्रमण के पाठ बोलने को अथवा शुभराग को प्रतिक्रमण माननेवाला तो मिथ्यात्व का ही सेवन करनेवाला है। शब्द तो जड़ हैं