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________________ प्रमेयबोधिनी टीका पद ३३ सू० ३ नैरयिकादीनामवधेः संस्थानादिनिरूपणम् ८०९ विस्तीर्ण उपरि च संक्षिप्तः प्रसिद्ध एवेति, 'गेवेज्जगदेवाणं पुच्छा' अवेयक देवानामवधिः कि संस्थानसंस्थित: प्रज्ञप्तः ? इति पृच्छा, भगवानाह-'गोयमा !' हे गौतम ! 'पुष्फचंगेरि संठिए पण्णत्ते' पुष्पचङ्गरीसंस्थानसंस्थितः-सूत्रग्रन्थित पुष्पसशिखाकरूप चङ्गेरीसंस्थानसंस्थितो ग्रैवेयकदेवानामवधिः प्रज्ञप्तः, 'अणुत्तरोववाइयाणं पुच्छा' अनुत्तरौपपातिकानां देवानामवधिः किं संस्थानसंस्थितः प्रज्ञप्तः ? इति पृच्छा, भगवानाह-'गोयमा !' हे गौतम ! 'जवनालिया संठिए ओही पण्णत्ते' जवनालकसंस्थानसंस्थित:-कन्याचोलकापरनाम जवनालक संस्थानसंस्थितोऽनुत्तरौपपातिकदेवानामवधिः प्रज्ञप्तः, एतेन चावधेः संस्थानप्रतिपादनेन भवनपति वानव्यन्तराणामूर्ध्वं प्रभूतोऽवधि वैमानिकानामधो ज्योतिष्क आकार का होता है । मृदंग एक प्रकार का बाद्य है जो नीचे विस्तीर्ण और ऊपर संक्षिप्त होता है और जो लोकमें प्रसिद्ध है। गौतमस्वामी-भगवन् ! ग्रैवेयक देवों का अवधि किस आकार का कहा गया है? भगवान्-हे गौतम ! पुष्पों की चंगेरी के आकार का होता है, अर्थात् सूत से गूंथे हुए पुष्पों की शिखा युक्त चंगेरी का जो आकार होता है, वही अवेयकदेवों के अवधिज्ञान का भी आकार होता है । ___ गौतमस्वामी-हे भगवन् ! अनुत्तरोपपातिक देवों के अवधिज्ञान का कैसा आकार होता है ? __ भगवान-हे गौतम ! अनुत्तरोपपातिक देवों के अवधिज्ञान का आकार जव नालक के आकार जैसा होता है । जवनालक का अर्थ है कन्या चोलक । अवधि के इस आकार निरूपण से फलित होता हैं कि भवनपतियों और वानव्यन्तरों का अवधि ऊपर की ओर अधिक होता हैं, वैमानिकों का नीचे की મૃદંગ એક પ્રકારનું વાદ્ય છે. જે નીચે વિસ્તીર્ણ અને ઉપર સંક્ષિપ્ત હોય છે અને જે सभा प्रसिद्ध छे. શ્રી ગૌતમસ્વામી–હે ભગવન્! ગ્રેવયક દેવના અવધિ કેવા આકારના કહ્યા છે? શ્રી ભગવાન–હે ગૌતમ! પુપિની ચંગેરીના આકારના હોય છે. અર્થાત્ સૂતરથી ગુંથેલા પુની શિખા યુક્ત ચંગેરીના આકારના હોય છે, તે જ રૈવેયક દેવના અવધિ જ્ઞાનને પણ આકાર હોય છે. શ્રી ગૌતમસ્વામી–હે ભગવન! અનુત્તરી પપાતિક દેવના અવધિજ્ઞાનનો આકાર કે હોય છે. શ્રી ભગવાન –હે ગૌતમ ! અનુત્તરપપાતિક દેવના અવધિજ્ઞાનનો આકાર જવનાલકના આકાર જે હોય છે જવનાલકને અર્થ છે-કન્યાચળી. અવધિના આકાર નિરૂપણથી ફલિત થાય છે કે ભવનપતિ અને વાનવ્યન્તરના શ્રી પ્રજ્ઞાપના સૂત્ર : ૫
SR No.006350
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Part 05 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1980
Total Pages1173
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_pragyapana
File Size76 MB
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