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________________ ४७६ प्रज्ञापनासूत्र अष्टपिधबन्धकाश्च भवन्तीति भावः, गौतम ! पृच्छति-'मणूसा णं भंते ! णाणावरणिज्ज स्स पुरछा' हे भदन्त ! मनुष्याः खलु ज्ञानावरणीयं कर्म बध्नन्तः कति कर्मप्रकृतीबे. ध्नन्ति ? इति पृच्छा, भगवान् मनुष्यपदे नव भङ्गकानाह-'गोयमा !' हे गौतम ! 'सव्ये ताव होजा सत्तविहबंधगा?' सर्वेऽपि तावद् मनुष्या भवेयुर्ज्ञानावरणीयं कर्म बध्नन्तः सप्त विधवन्धकाः१, 'अहवा सत्तविहबंधगा य अहविहांधगे य २' अथबा बहवो मनुष्याः सप्तविधषन्धकाश्च कश्चित्तु अष्टविधबन्धकश्च २ 'अहवा सत्तविहबंधगा य अट्ठविहबंधगा य ३' अधया बहर एव सप्तविधबन्धकाश्च अष्टविधबन्धकाश्च भवन्ति ३, 'अहवा सत्तविहबंधगा य छन्धिहबंधए य ४' अथवा बहवः सप्तविधबन्धकाश्च कश्चित् षड्विधवन्धकश्च ४, 'अहवा सत्तविहबंधगा य छविहबंधगा य५' अथवा बहव एव सप्तविधबन्धकाश्च षविधवन्धकाश्च भवन्ति ५, 'अहवा सत्तविहबंधगा य अट्टविहबंधगे य छविहबंधगे य ६' अथवा सप्तविधबन्धकाश्च बहयो भवन्ति कश्चित्तु अष्टविधबन्धकश्च कश्चिदेव षड्विधबन्धकश्च भवति ६, के बन्धक होते हैं। गौतमस्वामी-हे भगवन् ! मनुष्य ज्ञानावरणीय कर्म को बांधते हुए कितनी कर्मप्रकृतियों को बांधते हैं ? भगवान्-हे गौतम ! मनुष्य के विषय में नो भंग होते हैं, यथा-(१) सभी मनुष्य ज्ञानावरण को वांधते हुए सात प्रकृतियों के बन्धक होते हैं। __(२) बहुत से सात के बन्धक होते हैं, कोई एक आठ का बन्धक होता है। (३) बहुत से सात के घन्धक होते हैं और बहुत से आठ के भी बन्धक होते हैं। (४) बहुत से सात के बन्धक होते हैं, कोई एक छह का बन्धक होता है। (५) बहुत से सात के और बहुत से छह के बंधक होते हैं, (६) बहुत से सात के बन्धक होते हैं, एक आठ का बन्धक और एक छह (૩) ઘણું સાતના અને ઘણું આઠ પ્રકૃતિના બંધક હોય છે. શ્રીગૌતમસ્વામી- હે ભગવન્! મનુષ્ય જ્ઞાનાવરણીયકર્મ બાંધતા કેટલી કર્મપ્રકૃતિએને બાંધે છે? શ્રીભગવાન-હે ગૌતમ! મનુષ્યના વિષયમાં નવભંગ બને છે તે આ પ્રકારે છે(૧) બધા મનુષ્ય જ્ઞાનાવરણને બાંધતા રહીને સાત પ્રકૃતિના બંધક થાય છે. (૨) ઘણું સાતના બધક બને છે, કેઈ એક આઠને બંધક થાય છે. (૩) ઘણું સાતના બન્ધક થાય છે, અને ઘણા આઠના પણ બન્ધક થાય છે. (૪) ઘણું સાતના બન્ધક થાય છે અને કઈ એક ને બન્ધક બને છે. (૫) ઘણા સાતના અને ઘણા છના બન્ધક બને છે. (૬) ઘણા બધા સાતના બન્ધક થાય છે, એક આઠને બન્ધક અને એક કને શ્રી પ્રજ્ઞાપના સૂત્ર : ૫
SR No.006350
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Part 05 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1980
Total Pages1173
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_pragyapana
File Size76 MB
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