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________________ ५०४ जीवाभिगमसूत्रे ___टीका-'जंबुदीवं णाम दीवं लवणे णामं समुद्दे वट्टे' जम्बूद्वीपं नाम द्वीपम्, लवणो नाम समुद्रो वृत्तः स च वर्तुलः चन्द्रमण्डलवत्-मध्ये परिपूर्णोऽपि शङ्कयेत तत आह-'वलयागार संठाणसंठिए' वलयाकारं मध्यशुषिरं यत् संस्थानम् अवयवरचनाविशेषः तद्वद्गोलाकारेण संस्थितः स्थितिमानास्ते, 'सचओ समंता संपरिक्खित्ताणं चिटइ' सर्वतः सर्वत्र दिक्षु समन्ततः सामस्त्येन सर्वभावेण संपरिक्षिप्य-वेष्टयित्वा खलु तिष्ठति । 'लवणेणं भंते ! समुद्दे किं समचकवालसंठिए-विसमचक्कवालसंठिए' लवणः खलु भदन्त ! समुद्रः स किं समचक्रवालेन संस्थितः-उ विषमचक्रवालेन संस्थितः ? प्रश्नोत्तरं भगवानाह लवण समुद्र की वक्तव्यता'जंबुद्दीवं णामदीवं' इत्यादि ।। टीकार्थ-जंम्बूद्वीप नाम का मध्य द्वीप है इसके सम्बन्ध की यह पूर्वोक्त रूप से वक्तव्यता समाप्त हुई अव लवण समुद्र की वक्तव्यता प्रारंभ होती है। यह लवण समुद्र जम्बूद्वीप को चारों ओर से घेरे हुए हैं अतः इसका आकार वलय के जैसा गोल हो गया है यह लवण समुद्र सर्व दिशाओं में अच्छी तरह से संस्थापित परिवेष्टित हैं जिस प्रकार से जंबूद्वीप समस्त द्वीपों के मध्य में हैं उसी प्रकार से यह लवण समुद्र भी समस्त समुद्रों के मध्य में हैं । 'लवणेणं भंते ! समुद्दे किं समचक्क्वालसंठिए विसमचक्कवालसंठिए' हे भदन्त ! लवण समुद्र क्या समचक्रवाल संस्थान वाला है या विषम चक्रवाल संस्थान वाला है ? अर्थातू लवण समुद्र का संस्थान सम है या विषम है इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं-'गोयमा ! समचक्कवाल લવણસમુદ્રની વક્તવ્યતા 'जंबुद्दीवं णाम दीवं' त्याह ટીકાર્થ-જંબુદ્વીપ નામના મધ્યદ્વીપના સંબંધનું કથન સમાપ્ત કરીને હવે સૂત્રકાર લવણસમુદ્ર સંબંધી કથનને પ્રારંભ કરે છે. આ લવણસમુદ્ર જંબુદ્વીપને ચારે બાજુથી ઘેરાયેલ છે. તેથી તેને આકાર વલય (બલેયા)ના જે ગોળ થયેલ છે. આ લવણસમુદ્ર બધી જ દિશાઓમાં સારી રીતે સંસ્થાપિત અને પરિવેટિત છે. જે પ્રમાણે જંબુદ્વીપ સઘળા દ્વીપની મધ્યમાં છે તે જ પ્રમાણે 20 समुद्र ५ सपा समुद्रोनी मध्यमा छ. 'लवणेणं भंते ! समुद्दे किं समचक्कवालसंठिए विसमचक्कवालसंठिए' डे लावन् ! समुद्र समय વાલ સંસ્થાનવાળે છે કે વિષમચકવાલ સંસ્થાનવાળે છે? અર્થાત લવણસમદ્રનું સંસ્થાન સમ છે? કે વિષમ છે ? આ પ્રશ્નના ઉત્તરમાં પ્રભુશ્રી કહે છે કે જીવાભિગમસૂત્ર
SR No.006345
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Part 03 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1974
Total Pages1580
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_jivajivabhigam
File Size84 MB
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