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________________ १४३४ जीवाभिगमसूत्रे 'उक्कोसेणं क्णस्स कालो' उत्कर्षेण वनस्पतिकालः । ' नपुंसगवेयस्स जहन्नेणं अंतोमुहुत्तं उक्को सेणं सागरोवमसयपुहुत्त साइरेगं' नपुंसक वेदस्य जघन्यतोऽन्तर्मुहूर्ते तच्च स्त्रीवेदोक्तप्रकारेण ज्ञातव्यम्, उत्कर्षतः सागरोपशमशतपृथक्त्वं सातिरेकम् तत ऊर्ध्वं नियमतः संसारिणः सतो नपुंसकवेदोदय भावात् । 'अवेयगो जहा हेट्ठा' अवेदको यथा अधस्तात् अवेदको द्विविधः सायपर्यवसितः १ सादिसपर्यवसितश्च तत्र - साद्यपर्यवसितस्यान्तरं नास्ति अपर्यवसितत्वादेव, सादि सपर्यवसितस्य जघन्येनान्तर्मुहूर्तम् तावता कालेन कस्यापि श्रेणिसमारम्भात् उत्कर्षतोऽनन्तं कालमनन्ता उत्सर्पिण्यवसर्पिण्यः कालतः क्षेत्रतोपा पुलपरावर्त्त देशोनम् तावत्कालादूर्ध्वं पूर्वप्रतिपन्नोपशमश्रेणिकस्य पुनः श्रेणिसमार बाद जब उसका मरण हो जाता है तो वह पुरुषों में ही उत्पन्न होता है तथा उत्कृष्ट से इसका अन्तर वनस्पतिकाल प्रमाण है 'अवेयगे जहा हेट्ठा' अवेदक जीव दो प्रकार का होता है एक सादि अपर्यवसित और दूसरा सादि सपर्यवसित सादि अपर्यवसित का अन्तर होता नहीं है जो सादि सपर्यवसित अवेदक है उसका जघन्य से एक अन्तर्मुहूर्त का और उत्कृष्ट से अनन्तकाल का अन्तर है सादि सपवसित का जघन्य अन्तर जो एक अन्तर्मुहूर्त का कहा गया है वह कोई २ अवेदक जीव एक अन्तर्मुहूर्त के बाद पुनः श्रेणि पर समारोहण कर अवेदक अवस्था वाला बन जाता है तथा उत्कृष्ट अन्तर में अनन्त उत्सर्पिणी काल और अनन्त अवसर्पिणी काल समाप्त हो जाते हैं तथा क्षेत्र की अपेक्षा कुछ कम अर्धगुद्गल परावर्त काल समाप्त हो जाता है । इसके बाद उस पूर्व प्रतिपन्न उपशमश्रेणि वाले तथा उत्सृष्टथी तेनुं अ ंतर वनस्पतिक्षण प्रभानु' छे. 'अवेयगे जहा हेट्टा ' અવેઢક જીવ એ પ્રકારના હાય છે. એક સાર્દિ અપ વસિત અને ખીજા સાદિ સપ વસિત વેદ્યક છે. સાદિ અપ વસિતનું અંતર હેતુ નથી અને જે સાદિ સપ વસિત અવેદક છે. તેનું અંતર જઘન્યથી એક અંતર્મુહૂતનુ અને ઉત્કૃષ્ટથી અનંતકાળનુ અંતર છે. સાદિ સવતિનું જઘન્ય અંતર જે એક અંતર્મુહનું કહેવામાં આવેલ છે. તે કાઇ કાઇ અવેદક જીવ એક અંતર્મુહૂત પછી ફરીથી શ્રેણી પર આરાણુ કરીને અવેક અવસ્થાવાળા બની જાય છે. તથા ઉત્કૃષ્ટ અંતરમાં અનંત ઉત્સર્પિણી કાળ અને અનંત અવસર્પિણીકાળ સમાપ્ત થઇ જાય છે. તથા ક્ષેત્રની અપેક્ષાથી કઇંઇક કમ પુદ્ગલ પરાવ કાળ થઈ જાય છે. તે પછી એ પૂર્વ પ્રતિપન્ન ઉપશમ જીવાભિગમસૂત્ર
SR No.006345
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Part 03 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1974
Total Pages1580
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_jivajivabhigam
File Size84 MB
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