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________________ अनगारधर्मामृतवर्षिणी टोक अ० ७ धन्यसार्थवाहचिरितनिरूपणम् २०७ चिहनेन चिह्निताः,मुद्रिताः नाममुद्रादिनाऽङ्कितास्तान् कुर्वन्ति, कला 'कोट्ठागारस्स' कोष्ठागाहस्य एकदेशे स्थापयन्ति, स्थापयित्या संरक्षन्तः संगोपायन्तो विहरन्ति । ततः खलु ते कौटुम्बिका द्वितीये वर्षाराने द्वितीयवर्षसम्बन्धि चातुर्मास्यकाले प्रथमपादृषि प्राइट् पारम्भसमये महादृष्टिकाये निपतिते महावर्षायां सत्या क्षुल्लक केदारं 'सुपरिकम्मियं ' सुपरिकर्मितं विशिष्ट लक्ष्णमृत्तिकादिदानेन हलकुद्दालादिनोत्खनने च संस्कारितं कुर्वन्ति, कृत्वा तान् शालीन् वपन्ति 'दोच्चं पि तच्चंपि' द्विरपि त्रिरपि-द्वित्रिधारमापि' उक्खयनिहए ' उत्खातनिहतान्उत्पाटितरोपितान् यावत् लुनन्ति, यावत् चरणतलमृदितान् कुर्वन्ति, कृत्वा पुनन्ति से चिह्नित कर उनपर नामकी मुहर लगा दो । पश्चात् भंडार में उन्हें एक ओर रख दिया । समय २ पर वे लोग उनकी रक्षा और संभाल भी करते रहे। (तएणं ते कौटुंबिया दोच्चपि वासारत्तंसि पढम पाउसंसि महाबुट्टिकायंसि निवइयंसि खुट्टागं केयारं सुपरिकम्मियं काति) इसके बाद उन कौटुम्विक पुरुषोने द्वितीय वर्ष संबन्धी चौमासा जब लगा -तब-सर्व प्रथम महवृष्टि के रूप में जल के बरस जाने पर, हल से जोत कर तथा कुदाल आदि से खोदकर एक छोटा सा खेत तैयार किया। उसमें चिकनी और नरम मिट्टी डालकर उसे बहुत ही अच्छा शालि उपजाने के योग्य बना दिया । (ते शालि वपंति, दोच्यपि तच्चपि उक्खय निहए जाव लुणेति ) बादमें उस शालों को उसमें बो दिया। पहिले की तरह जब वह धान्य अंकुरित हो आई तब उन्होंने उसे वहां से उखाड कर दूसरी जगह आरोपित कर दिया। इस तरह यह भूकी धा. यथा समय तेसो तभनी सम ५५५ ।मता उता. (तएणं ते कौंडुबिया दोच्चंचि वासारतसि पढम पाउसंसि महावुढिकायंसि निवइयसि खुड्डागं के यारं सुपरिकम्मियं करेंति) (या२ ५छी टुमि पुरुषाये भीon १र्षे ચોમાસાના દિવસે આવ્યાં ત્યારે સૌ પહેલાં મહાવૃષ્ટિના રૂપે જળવષ થયા બાદ હળથી ખેડીને તેમજ કોદાળી વગેરે થી ખેદીને એક નાનું ખેતર તૈયાર કર્યું જેમાં ચીકણી અને કમળ માટી નાખીને તેને ખૂબ જ સરસ શાલિ (i॥२) ११॥ यो२५ मनावी दीधु. (ते सालीवपंति, दोच्चंपि तच्चपि उक्खयनिहए जाव लुणेति) त्या२ ५छी तरमा शालिनवावी हीधी. પહેલાંની જેમ જ્યારે શાલિના અંકુરે બહાર નીકળ્યા ત્યારે કૌટુંબિક માણસો એ તેના છેડેને ત્યાંથી ઉપાડીને બીજા સ્થાને રોપી દીધા. આ શ્રી જ્ઞાતાધર્મ કથાંગ સૂત્રઃ ૦૨
SR No.006333
Book TitleAgam 06 Ang 06 Gnatadharma Sutra Part 02 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1963
Total Pages846
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_gyatadharmkatha
File Size47 MB
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