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________________ ७६२ भगवतीसो जीवाः खलु भदन्त ! प्रदेशार्थतया किं कृतयुग्माः पृच्छा ? हे भदन्त ! प्रदेशार्थतया सामान्यतो जीवा कि कृतयुग्माः योजाः द्वापरयुग्माः कल्योजावेति प्रश्नः ? भगवानाह-'गोयमा' इत्यादि । 'गोयमा' हे गौतम ! 'जीवपएसे पडुच्च ओघा. देसेण वि विहाणादेसेण वि कडजुम्मा' जीवपदेशान् प्रतीत्य ओघादेशेन सामान्यतोऽपि विधानादेशेन-भेदप्रकारेणाऽपि कृतयुग्माः, समस्तजीवानां प्रदेशा अनन्तस्वादवस्थितत्वाच चतुरया एव भवन्ति । तथा प्रत्येकस्य जीवस्यापि पदे. शानाम् असंख्यातत्वा दवस्थितत्वाच्च चतुरमा एव भवन्ति । तस्मात्-सामा. न्यतोऽपि विशेषतोऽपि प्रदेशार्थतया जीवाः कृतयुग्मा एव भवन्तीति । 'नो तेओगा-नो दावरजुम्मा नो कलिओगा' नो योजाः नो द्वापरयुग्मा:-नो वाश्री गौतमस्वामी ने प्रभुश्री से ऐसा पूछा है-हे भदन्त ! समस्त जीव क्या प्रदेशरूप से कृतयुग्मरूप होते हैं ? अथवा योजरूप होते हैं? अथवा द्वापर युग्मरूप होते हैं ? अथवा कल्योजरूप होते हैं-'गोयमा! जीवपएसे पडुच्च ओघादेसेण वि विहाणादेसेण वि कडजुम्मा' हे गौतम ! सामान्य से भी और भिन्न भिन्न रूप से भी जीव प्रदेशों की अपेक्षा से कृतयुग्मरूप ही होते हैं। तात्पर्य यही है कि समस्त जीवों के प्रदेश अवस्थित अनन्त होते हैं, इसलिये वे कृत. युग्मरूप ही होते हैं और विशेष रूप से भी-एक एक जीव की अपेक्षा से भी एक एक जीव के प्रदेश अवस्थित असंख्यात २ होते हैं इस लिये भी वे कृतयुग्मरूप होते हैं । इसलिये प्रदेशरूप से जीव सामान्य और विशेष स्थिति में कृतयुग्म राशिवाले ही होते हैं। 'नो ते भोगा, नो दावरजुम्मा, नो कलिओगा' वे न योजरूप होते हैं, न द्वापरयुग्मकि कड जुम्मा पुन्छा' 24॥ सूत्र॥४ १२॥ श्री गौतमस्वामी प्रभुश्रीन मे पूछे છે કે હે ભગગન સઘળા જ પ્રદેશપણથી શું કૃતયુગ્મરૂપ હોય છે? અથવા દ્વાપરયુગ્મ રૂપ હોય છે? અથવા કલ્યાજ રૂપ હોય છે? આ પ્રશ્નના ઉત્તરમાં प्रभुश्री छ है-'गोयमा ! जीवपएसे पडुच्च ओघादे सेणं वि विहाणादेसेण वि कड़जुम्मा' गौतम ! सामान्यथा ५४ मन नुहा ३५था ५१ प्रशानी અપેક્ષાથી કૃતયુગ્મ રૂપ જ હોય છે, કહેવાનું તાત્પર્ય એ છે કે સઘળા ના પ્રદેશે અવસ્થિત અનંત હોય છે. એટલા માટે તે કૃતયુમ રૂપ જ હોય છે, અને વિશેષપણાથી પણ એક એક જીવની અપેક્ષાએ પણ એક એક જીવના પ્રદેશે અવસ્થિત અસંખ્યાત હોય છે. એથી પણ તેઓ કૃતયુગ્મ રૂપ હોય છે. જેથી પ્રદેશપણાથી જીવ સામાન્ય સ્થિતિમાં કૃતયુગ્મ રાશીવાળા જ डाय छे, 'नो तेओगा नो दावरजुम्मा नो कलिओगा' तम्मा यो ३५होता શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૧૫
SR No.006329
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 15 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1971
Total Pages969
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size57 MB
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