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________________ प्रमेयचन्द्रिका टीका श०२५ उ.३ १०३ प्रदेशतोऽवगाहतच संस्थाननि० ६३५ मतरवृत्तं जघन्येन पञ्चपदेशिकं' पञ्चपदेशावगाढम् आ. नं.३ 'उक्कोसेणं ।। अर्णतपएसिए असंखेजपएसोगादे' तत् प्रतरवृत्तमुत्कर्षे गाऽनन्तमदे. ." शिकम्, तथा असंख्यातपदेशावणादम् असंख्याते आकाशपदेशे तस्या. ० ० रगाहना भवतीत्यर्थः । 'नस्थ गंजे से जुम्मपएसिए से जहन्नण बारस. आ. न. ३ पएसिप' तत्र खलु यत् तत् युग्मदेशिक मनरवृत्तं तत् द्वादशपदेशिकम् ०० 'यारसपएसोगाढे" द्वादसमदेशावगाढम् एतस्य स्थापनाचेत्थम् आ.नं. ४ ० ० ०० 'उकोसेणं अणंतपएसिए असंखेजपएसोगा' उत्कर्षेगाऽनन्तमदेशिकम् ४०० ०००० असंख्येयमदेशावगाढम् । 'नत्य णं जे से घणवट्टे से दुविहे पत्ते' तत्र आ.नं. ४ संस्थान है । 'तत्य ण जे से आपपएसिए से जहन्ने पंच पएसिएपंच परसोगाढे' 'ओजप्रदेशिक वृत्तसंस्थान जघन्य से पांच प्रदेशों वाला हाता है और उनमें जो पांच प्रदेशों में उसका अवगाह होता है इसका आकार सं. टीकामें आ० ३ में देख लेवे 'उकोसेण अणत पएसिए असंखेज्जपएसोगाढे' तथा उत्कृष्ट से ओजपदेशिकवृत्त संस्थान अनन्त प्रदेशों वाला होता है और असंख्यात प्रदेशों में इसकी अवगाहना होती है। अर्थात् असंख्योत आकाश प्रदेश में इसकी अवगाइना होती है। 'तत्थण जे से जुम्मपएसिए से जहन्नेण धारसपएसिए' तथा जो युग्मप्रदेशिक प्रतरवृत्त है वह जघन्य से बारह १२ प्रदेशों वाला होता है और बारह १२ प्रदेशों में उसकी अवगाहना होती है। इसका आकार सं. टीकामें आ०४ चार से दिया है। __'उकोसेण अणतपसिए असंखेजपए लोगाढे' तथा युग्मप्रदेशिक जो प्रतरवृत्त है वह उत्कृष्ट से अनल प्रदेशों वाला होता है और ओयपएसिए से जहन्नेणं पंचपएसिए पंचपएसोगाढे' मा ४ प्रशाणु वृत्त સંસ્થાન જઘન્યથી પાંચ પ્રદેશેવાળું હોય છે અને પાંચ પ્રદેશોમાં તેને અવ. गाह थाय. तेनी २ स. टीममा० न. 3थी सतावे छे. 'उक्कोसेणं अणंत पएसिंए असंखेज्ज पएसोगाढे' तथा टथी शिवाणु वृत्तसंस्थान અનંત પ્રદેશ વાળું હોય છે અને અસંખ્યાત પ્રદેશમાં તેની અવગાહના થાય છે. અર્થાત્ અસંખ્યાત આકાશ પ્રદેશમાં તેની અવગણના થાય છે. 'तत्थ णं जे से जुम्मपएसिए से जहन्नेणं बारसपएसिए' तथा तमा युमहेश વાળું પ્રતરવૃત્તસંસ્થાન છે, તે જ ઘન્યથી બાર પ્રદેશવાળું હોય છે. અને બાર પ્રદેશમાં તેઓની અવગાહના થાય છે. તેને આકાર સં. ટીકામાં આ૦ નં. ४ मां सतावे छे. 'उक्कोसेणं अणंतपएसिए अस खेजपएसोगाढे तथा रे યુમ પ્રદેશ વાળું પ્રતર વૃત્ત સંસ્થાન છે તે ઉત્કૃષ્ટથી અનંત પ્રદેશોવાળું શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૧૫
SR No.006329
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 15 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1971
Total Pages969
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size57 MB
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