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________________ प्रमेयचन्द्रिका टीका श०२५ उ.३ २०२ रत्नप्रभादिपृथिव्यपेक्षया सं०नि० ६२१ यत्र वृत्तमेकं संस्थानं यवाकारनिष्पादक तत्र यानि परिमण्डलसंस्थानानि तानि न संख्येयानि न वा असंख्येयानि किन्तु अनन्तान्येव भान्तीत्यर्थः, 'वटा संठाणा एवं चेत्र' वृतानि संस्थानानि एवमेव यया यवाकृतिनिष्पादकत संस्थानसमुदाये विद्यमानानि परिमण्डल संस्थानानि अनन्तानि तथैव यातिनिष्पादकवृत्तसंस्था नसमुदाये तदन्यानि वृतसंस्थानानि यानि तान्यपि अन्नान्येव न तु संख्यातानिन तु असंख्यातानि वेति। एवं जाव आयया' एवं यावदायवानि आ यावत्पदेन एकस्मिन् वृनसंस्थानपदेशे व्यस्रव रसायतसंस्थानानि, प्रत्येक न संख्यातानि नासंख्यातानि अपितु अनन्तान्येवेति भावः 'एवं पुणरवि एक्केकेणं संठाणेणं पंच वि चारेयमा जहेब हेठिल्ला जाव आयएणं' एवं पुनरपि एकैकेन संस्थानेन सह याकार निष्पादक वृत्तसंस्थान है वहां जितने परिमंडल संस्थान हैं वे संख्यात अथवा असंख्यात न होकर अनन्त ही होते हैं। 'वहा संठाणा एवं चेव' वृत्त संस्थानों के सम्बन्ध में भी ऐसा ही कथन जानना चाहिये अर्थात् यवाकृतिनिष्पादक वृत्तसंस्थान समुदाय में विद्यमान परिमंडल संस्थान जिप्त प्रकार से अनन्त प्रकट किये गये हैं उसी प्रकार से यवाकृतिनिष्पादक वृत्तसंस्थान समुदाय में इससे अन्य और भी जो वृत्तसंस्थान है वे अनन्त कहे गये हैं, संख्यात असंख्यात नहीं। 'एवं जाव आयया' इसी प्रकार का कथन यावत् प्रायनसंस्थानतक करना चाहिये-अर्थात्-एक वृत संस्थान प्रदेश में व्यस्रसंस्थान, चतुरस्र संस्थान और आयतसंस्थान ये प्रत्येक ही अनन्त हैं संख्यात अथवा असंख्घात नहीं हैं। 'एवं पुणरवि एक्केकेणं संठाणे] पंचविचारेयन्या जहेव हेठिल्ला जाव आयएग' इस प्रकार से पुनः एक एक જ્યાં યવાકાર નિપાદક વૃત સંસ્થાન છે, ત્યાં જેટલા પરિમંડલ છે, તે नया संयात, असयात नथी परंतु अनंत छ. वट्टा सठाणा एवं चेव' वृत्त संस्थानाना सभा ५५ को प्रमाणुनु ४यन सभा अर्थात् યવાકૃતિ નિપાદક વૃત્ત સંસ્થાન સમુદાયમાં રહેલ પરિમડલ સંસ્થાન જે પ્રમાણે અનન્ત હોવાનું કહ્યું છે. એ જ પ્રમાણે યવકૃતિ નિષ્પાદક વૃત્ત સંસ્થાન સમુદાયમાં આનાથી જુદા બીજા જે વૃત્ત સંસ્થાને છે, તે અનંત કહ્યાં છે. सच्यात अथवा मसभ्यात ४ नथी. “एवं जाव आयया' मा प्रभातुं કથન યાવત્ આયત સંસ્થાન સુધી કરવું જોઈએ અર્થાત્ એક વૃત્ત સંસ્થાન પ્રદેશમાં વ્યસ્ત સંસ્થાન, ચતુરસ્ત્ર સંસ્થાન, અને આયત સંરથાન એ દરેક मन छ. यात मया असभ्यात नथी. 'एवं पुणरवि एक्केकेणं શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૧૫
SR No.006329
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 15 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1971
Total Pages969
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size57 MB
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