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________________ भगवतीसूत्रे उत्कर्षेणाऽपि त्रयस्त्रिंशत्पागरोपमाणि द्वाभ्यां पूर्वकोटीभ्यामभ्यधिकानि प्रथम मनुष्यभवे जघन्या स्थितिवर्षपृथक्त्वप्रमिता, सः सर्वार्थसिद्ध त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमस्थिति भुक्त्वा पुनर्मनुष्य भवे वर्ष पृथक्त्वस्थितिको जातः सन् मोक्षं गच्छतीति द्वाभ्यां वर्ष पृथक्त्वा पधिकानीत्युक्तम् एवमुत्कर्षता द्वाभ्यां पूर्वकोटीभ्यामभ्पधिकानीत्युक्तं तदपि मनुष्यभवद्धयमपेक्ष मोक्तमित्यतो मनुष्यभवद्वय सर्वार्थसिद्धदेव. भवेतिभवत्रय स्थितिमाश्रित्य कायसंवेधो विज्ञेय इति । 'एचइयं जाव करेजा' एतावन्न कालं मनुष्यमति सर्वार्थसिद्धकदेवगतिं च सेवेत तथा एतावदेव कालं है और 'उक्कोसेण वि तेत्तीसं सागरोवमाई दोहिं पुब्धकोडीहिं अबभहियाई उत्कृष्ट से भी दो पूर्वकोटि से कुछ अधिक ३३ सागरोपम का है । पहिले मनुष्य भव में जघन्पस्थिति वर्षपृथक्त्व की है । सो ऐसा वह मनुष्य सर्वार्थसिद्ध में ३३ सागरोपम की स्थिति को भोगकर पुनः मनुष्य भव में वर्षयत्व की स्थितिवाला होता है और मोक्ष चला जाता है । इसलिये जघन्य स्थितिकाल की अपेक्षा लेकर ३३ तेतीस सागरोपम और दो वर्ष पृथक्त्य से अधिक कही है। तथा जो उत्कृष्ट स्थिति दो पूर्वकोटि अधिक ३३ तेतीस सागरोपम की कही गई है वह भी दो पूर्वकोटि की उत्कृष्ट स्थितिवाले मनुष्य भव को आश्रित करके कही गई है। इस प्रकार मनुष्य के दो भव और सर्वार्थसिद्धदेव भव इन तीन भवों को आश्रित करके कायसंवेध कहा गया है। 'एवइयं जाव करेज्जा' इस प्रकार से वह जीव इतने कालतक मनुष्यगति का और सर्वार्थसिद्ध देवगति का सेवन करता है और शेपमना छ, भने 'उनकोसेण वि तेत्तीस सागरोवमाइ दोहि पुनकोडीहिं अभ हियाई थी ५६१ मे. पू रथी ४४४ अपि 33 तेत्रीस सागरामना છે. પહેલા મનુષ્ય ભવમાં જ ઘન્ય સ્થિતિ વર્ષપૃથકૃત્વની છે. તે એવી તે મનુષ્ય સર્વાર્થ સિદ્ધમાં ૩૩ તેત્રીસ સાગરોપમની સ્થિતિને ભેગવીને ફરીથી મનુષ્ય ભવમાં વર્ષ પ્રથકૃત્વની સ્થિતિવાળો થાય છે. અને મોક્ષ ગતિમાં જાય છે. તેથી જઘન્ય કાળની સ્થિતિને લઈને ૩૩ તેત્રીસ સાગરોપમ અને બે વર્ષ પૃથફત્વથી અધિક કહી છે. તથા જે ઉત્કૃષ્ટ સ્થિતિ બે પૂર્વકેટિ અધિક ૩૩ તેત્રીસ સાગરોપમની કહી છે. તે પણ બે પૂર્વ કોટિની ઉત્કૃષ્ટ રિથતિવાળા મનુષ્યભવને આશ્રય કરીને કહેલ છે. આ રીતે મનુષ્યના બે ભવ અને સર્વાર્થસિદ્ધ है५ ९१ मे शत्रण भवानी माश्रय ४रीन पायसवेध छे. 'एवइयं जाव ગા’ આ રીતે તે જીવ આટલા કાળ સુધી મનુષ્યગતિનું અને સર્વાર્થસિદ્ધ શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૧૫
SR No.006329
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 15 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1971
Total Pages969
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size57 MB
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