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________________ ३९६ भगवतीसूत्र परन्तु अवगाहनांशे वैलक्षण्यं वक्ति-'नवरं' इत्यादिना । 'नवरं ओगाहणा गोयमा एगे भवधारणिज्जे सरीरए' नवरं केवलं शरीरावगाहना हे गौतम ! एकं भव. धारणीयं शरीरम्, हे गौतम! ग्रैवेयकदेवानामेक अवधारणीयमेव शरीरं भवति किन्तु वैक्रियशरीरं न भवति कल्पातीतदेवानामुत्तरवैक्रियशरीरस्याभावात् 'सा जहन्नेणं अंगुलस्स असंखेज्जइभाग' सा भवधारणीयशरीरस्यावगाहना जघन्येनाऽङ्गुलस्यासंख्येयभागम् 'उकोसेणं दो रयणीओ' उत्कर्षेण द्वे रस्नी, उत्कृष्टतः शरीरावगाहना हस्तद्वयप्रमाणा भवतीत्यर्थः 'संठाणं एगे भवधारणिज्जे सरीरे' संस्थानम् एकं भवधारणीयमेव शरीरं भवति, नोत्तरवैक्रियं कल्पातीतदेवानामु. तरक्रियशरीराभावात् 'नो चेव णं वेउधिए' इत्यादि वचनात्। 'से समचउरंस जानना चाहिये। परन्तु अवगाहनांश में जो विलक्षणता है उसे सूत्रः कार ने 'नवरं ओगाहणा गोयमा! एगे भवधारणिज्जे सरीरए' इस सूत्र द्वारा प्रकट किया है। इसके द्वारा यह समझाया गया है कि हे गौतम ! ग्रैवेयक देवों के एक भवधारणीय ही शरीर होता है वैक्रिय शरीर नहीं होता है क्योंकि कल्पातीत देवों के उत्तर वैक्रिय शरीर का अभाव होता है। अतः 'सा जहन्नेणं अंगुलस्स असंखेज्जाभार्ग' वह भवधारणीय शरीर की अवगाहना जघन्य से अंगुल के असंख्या. तवें भाग प्रमाण होती है और 'उक्कोसेणं दो रयणीओ' उत्कृष्ट से वह दो रत्ति प्रमाण होती है-दो हाथकी होती है 'संठाणं एगे भव. धारणिज्जे सरीरे' संस्थान उनके एक भवधारणीय ही शरीर होता है उत्तर वैक्रिय शरीर नहीं होता है। क्योंकि कल्पातीत देवों के उत्तर वैक्रिय शरीर का अभाव होता है 'नो चेवणं वे उत्रिये' ऐसा सिद्धान्तસમજવું પરંતુ અવગાહનાના અંશમાં જે જુદાપણું આવે છે. તે સૂત્રકારે 'नवर ओगाहणा गोयमा । एगे भवधारणिज्जे सरीरए' मा सत्र द्वारा प्रकट કરેલ છે. આ સૂત્રથી એ સમઝાવ્યું છે કે-હે ગૌતમ! રૈવેયકદેવોને એક ભવધારણીય શરીર જ હોય છે. વૈક્રિય શરીર હેતું નથી. કેમકે કલ્પાतीत हेपोन उत्तर वैठिय शरीर मा य छे. रथी 'सा जहन्नेणं अंगु. लस्स असंखेज्जइभार्ग' अवधारणाय शरीरनी शासन धन्यथी मin. जना असभ्यातमा मास प्रमाणुनी डाय छे. भने, 'उक्कोसेणं दो रयणीओ' ઉત્કૃષ્ટથી તે બે પત્નિપ્રમાણ હોય છે.–બાંધેલ મૂઠિવાળા બે હાથ પ્રમાણુની डाय छ, 'संठाणं एगे भवधारणिज्जे सरीरे' तमान संस्थान से अवधारणीय શરીર જ હોય છે. ઉત્તર વૈકિય શરીર હોતું નથી. કેમકે-કલ્પાતીત वो उत्तर यि शरीरनो मनाय छे. 'नो चेव णं वेडम्बिए' શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૧૫
SR No.006329
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 15 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1971
Total Pages969
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size57 MB
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