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________________ प्रमेयचन्द्रिका टीका श०२४ उ.२० सू०६ देवेभ्यः पतिर्यग्योनिकेत्पातः ३३५ यावद् वानव्यन्तरः खलु भदन्त ! 'जे भविए' यो भव्यः 'पंचिदियतिरिक्वजोगिएसु उववज्जित्तए' पञ्चेन्द्रियतिर्यग्योनिकेषु उत्पत्तुम् ‘से णं भंते' स खलु भदन्त ! 'केवइयकालटिइएसु उववज्जेज्जा' स कियकालस्थितिकेषु पश्चेन्द्रिय तिर्यग्योनिकेषु उत्पधे तेवि प्रश्नः । भगवानाह-'एवं चेव' एवमेव एवम्-असुरकुमारवदेव नवापि गमाः ज्ञातव्या इति । 'नवरं ठिई संवेहं च जाणेज्जा' नवरम्केलं स्थिति संवेधं च भिन्नभिन्नतया यथायोगं जानीयादिति नवगमाः ९। 'जइ जोइसियदेवेहिंतो उवाज्जति' हे भदन्त ! यदि ज्योतिष्कदेवेभ्य आगत्य पञ्चे. न्द्रियतिर्यग्योनिकेषु उत्पद्यन्ते तदा किं चन्द्रेभ्यः, सूर्येभ्यः, ग्रहेभ्यः, नक्षत्रेभ्यः, यावत्-'वाणमंतरे णं भंते !' हे भदन्त ! जो वानव्यन्तर 'जे भविए पंचिंदियतिदिक्खजोणिएलु उववज्जित्तए' पञ्चेन्द्रिय तिर्यग्योनिकों में उत्पन्न होने के योग्य होता है। 'से णं भंते ! केवइयकाल टिहएसु उव. ज्जेज्जा' हे भदन्त ! वह कितने काल की स्थिति वाले पंचेन्द्रिययिर्यगयोनिकों में उत्पन्न होता है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं-'एवं चेव' है गौतम! इस विषय में असुरकुमार के जैसे ही नौ गमक जानना चाहिये । परन्तु 'नवरं ठिई संवेहं च जाणेज्जा' परन्तु यहां पर स्थिति और संवेध को असुरकुमार के प्रकरण में कही गयी स्थिति और संवेध से भिन्न जानना चाहिये। इस प्रकार से यहां नौ गम है। 'जह जोइसियदेवेहितो उववज्जति' अब गौतम प्रभु से ऐसा पूछते हैं-हे भदन्त ! यदि ज्योतिषिक देवों से आकरके पश्चेन्द्रियति. सभा से. 'जाव' यावत वाणमंतरे णं भंते ! 3 मापन रे पान०यन्त२ हेव। 'ने भविए पंचि दियतिरिक्खजोणिएसु उववज्जित्तए' ने भव्य पयन्द्रियतिय"य योनिमा अत्यन्न थवाने योग्य हाय छे. से णं भंते' सन् 'केवइयकालदिइएसु उववजेज्जा' तटसा बनी स्थिति सज्ञी ५'यन्द्रियतिय य योनिमा 4-1 थाय छ १ मा प्रश्न उत्तरमा प्रभु से छे -'एवं चेव' આ સંબંધમાં અસુરકુમારના કથન પ્રમાણેના નવ ગમો સમજવા. પરંતુ 'नवरं ठिई संवेहच जाणेज्जा' ५२तु अडियो स्थिति भने सधना थनमा અસરકારના પ્રકરણમાં કહેલ સ્થિતિ અને સંવેધના કથન કરતાં જુદાપણું છે. તેમ સમજવું આ રીતે અહિયાં નવ ગમે સમજવા. 'जह जोइसियदेवेहितो उववज्जति' हवे गौतमस्वामी प्रभुने मे पूछे છે કે-હે ભગવદ્ જોતિષિક દેવોમાંથી આવીને સંજ્ઞી પંચેન્દ્રિયતિર્યંચ શ્રી ભગવતી સૂત્ર: ૧૫
SR No.006329
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 15 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1971
Total Pages969
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size57 MB
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