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________________ ३०२ भगवती सूत्रे इत्यादि । 'गोयमा' हे गौतम! 'सन्निमणुस्सेहितो वि उववज्जंति असन्निमणुस्सेहिंतो वि उववज्जंति' संज्ञिमनुष्येभ्योऽपि आगत्य असंज्ञिमनुष्येभ्योऽपि आगत्योत्पद्यन्ते सज्ञि पञ्चेन्द्रिय तिर्यग्योनिका इत्युत्तरम्। 'अतन्निमणुस्से णं भंते ' असंशिमनुष्यः खलु भदन्त ! 'जे भविए सन्निपंचिदियतिरिक्खजोगिएसु उववज्जितए' यो भव्यः संज्ञिपश्चेन्द्रियतिर्यग्योनिकेषु उत्पत्तुम् 'से णं भंते! केवइयकालट्ठिए उववज्जेज्जा' स खलु भदन्त ! कियत्कालस्थितिकेषु उत्पद्येतेति प्रश्नः । भगचानाह - 'गोयमा' इत्यादि । 'गोयमा' हे गौतम! 'जहन्नेणं अंतोडिएस उववज्जेज्जा' जघन्येनान्तर्मुहूर्त स्थिति केषु पञ्चेन्द्रियतिर्यग्योनिकेषु उत्पद्येत, 'उको आकरके उत्पन्न होते हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में प्रभु गौतम से कहते हैं- 'गोयमा' हे गौतम 'सन्निपणुस्सेहितो वि उववज्जति असन्निमणुस्सेहिंतो वि उववज्जंति' पञ्चेन्द्रिय तिर्यग्योनिक जीव संज्ञी मनुष्यों से मी आकर के उत्पन्न होते हैं और असंज्ञी मनुष्यों से भी आकर के उत्पन्न होते हैं। अब गौतम प्रभु से ऐसा पूछते हैं - 'असन्नि मणुस्से णं भंते । जे भविए पंचिदिय तिरिक्ख जोणिएस उबवज्जिन्स' हे भदन्त ! जो असंज्ञी मनुष्य पञ्चेन्द्रियतिर्यग्योनिकों में उत्पन्न होने के योग्य है 'से णं भंते! hasयकालट्ठिएस उववज्जेज्जा' वह कितने काल की स्थितिवाले पचे. न्द्रियतिर्यग्योनिकों में उत्पन्न होता है ? इसके उत्तर में प्रभु गौतम से कहते हैं-'गोयमा' हे गौतम! 'जहन्नेणं अंनोमुहुतडिइएस उबवज्जेज्जा' અસ'ની મનુષ્યેામાંથી આવીને ઉત્પન્ન થાય છે ? આ પ્રશ્નના ઉત્તરમાં પ્રભુ गौतमस्वाभीने उडे छे है - 'गोयमा !' हे गौतम! 'सम्निमनुस्सेहिंतों वि ववज्जति असन्निमणुस्सेहिंतो वि उववज्र्ज्जति' सज्ञी पथेन्द्रियतियय योनिવાળા જીવે સંજ્ઞી મનુષ્યોમાંથી આવીને ઉત્પન્ન થાય છે. અને અસ’જ્ઞી મનુચૈામાંથી આવીને પશુ ઉત્પન્ન થાય છે. हवे गौतमस्वाभी अलुने खेलुं पूछे छे हैं - 'असन्तिमणुस्से ण भने ! जे भवि पंचियतिरिक्खजोणिरसु उववज्जित्तर' हे लगवन् ? असं ज्ञी मनुष्य पथेन्द्रिय तिर्यययोनिअमां उत्पन्न थवाने योग्य है, 'से णं भंते ! केवइय कालट्टिइएस उववज्जेज्जा' ते डेंटला भजनी स्थितिवाजा संज्ञी पथेन्द्रियतिय य યોનિકમાં ઉત્પન્ન થાય છે ? આ પ્રશ્નના ઉત્તરમાં પ્રભુ ગૌતમસ્વામીને કહે छ - 'गोयमा !' हे गौतम! ' जहन्नेणं अतो मुहुत्तट्ठिइएस उबवज्जेज्जा' ते જધન્યથી એક અંતમુહૂતની સ્થિતિવાળા સન્ની પ'ચેન્દ્રિયતિયચ યોનિકામાં શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૧૫
SR No.006329
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 15 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1971
Total Pages969
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size57 MB
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