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________________ प्रमैयचन्द्रिका टीका श०२४ उ.१८ सू०१ त्रोन्द्रियजोवोत्पत्यादिनिरूपणम् २०३ न वा देवेभ्य आगत्योत्पद्यन्ते इत्युत्तरम् सर्वमपि नवमगमकान्तं द्वीन्द्रियवदेव अवगन्तव्यमिति । त्रीन्द्रियाणां द्वीन्द्रियापेक्षया यद्वैलक्षण्यं तदर्शयति-'णवरं' इत्यादि, 'णवरं ठिई संवेहं च जाणेज्जा' नवरं स्थिति संवेधं च जानीयात् स्थिति त्रीन्द्रियेषु समुत्पद्यमानानां पृथिव्यादीनामायुःसंवेधं त्रीन्द्रियोत्पित्सुपृथिव्यादीनां द्वित्रीन्द्रियजीवानां च स्थितेः संयोग जानीयात् एतदेव तत्तत्स्थले दर्शयति-तेउकाइएसु सम तइयगमे तेजस्कायिकैः समं तृतीयगमे स एवं उत्कृष्टकालस्थितिक त्रीन्द्रियरूपे गमे 'उक्कोसेगं अठुत्तराई बे राई दियसयाई उत्कर्षेणाऽष्टोत्तरे द्वे रात्रिदिवशते, तेजस्कायिकैः सह त्रीन्द्रियाणां स्थितिसंवेधस्तृतीयगमे उत्कर्षण अष्टोत्तरे द्वे रात्रिदिवशते। कथमेवं भवतीति चेदित्यम् औधिकस्य तेजस्कायिआकरके उत्पन्न होते हैं और मनुष्यों से आकरके उत्पन्न होते हैं। नैरयिकों से अथवा देवों से आकरके वे तेइन्द्रिय रूप से उत्पन्न नहीं होते हैं। इस प्रकार के प्रश्न और उत्सर द्वीन्द्रिय प्रकरण के जैसे नौ गम तक यहां कर लेना चाहिये । पर हीन्द्रिय प्रकरण की अपेक्षा जो इस तेइंद्रिय के प्रकरण में विशेषता है वह 'नवरं ठिई संवेहं च जाणेज्जा' स्थिति और संवेध की अपेक्षा से है। यही बात सूत्रकार आगे के सूत्रपाठ से प्रकट करते हैं-'तेउकाइएसु समं तइयगमे तेजस्कायिकों के साथ तृतीय गम में उत्कृष्ट काल की स्थिति वाले त्रीन्द्रिय रूप आला. पक में तेइन्द्रिय जीव का उत्कृष्ट कायसवेध 'उकोसेणं अठुत्तराईबे राइंदियसयाई' उत्कृष्ट से दौसौ आठ २०८ रात्रि दिवस का है यह कैसे होता है ? तो ऐसे होता है सुनो-औधिक तेजस्कायिक के चार મનુષ્યમાંથી આવીને પણ ઉત્પન્ન થાય છે. નરયિકમાંથી અથવા દેવામાંથી આવીને તેઓ પણ ત્રણ ઈન્દ્રિયપણથી ઉત્પન્ન થતા નથી. આ રીતના પ્રશ્નોત્તર બે ઈન્દ્રિયેના પ્રકરણની જેમ નવમા ગામ સુધીના ગમે અહીં કહેવા જોઈએ. પરંતુ બે ઈન્દ્રિયના પ્રકરણ કરતા આ ત્રણ ઈન્દ્રિયના પ્રકરણમાં જે વિશેષપણું छ. त यिनी 'नार ठिइस वेहं च जाणेज्जा' स्थिति भने सवैध सभी વિશેષપણુ છે. એજ વાત સૂત્રકારે આગળના સૂત્રપાઠથી પ્રગટ કરેલ છે. 'ते उक्काइए सम तयगमे' ते४२४यिनी साथे श्री मम Greenनी સ્થિતિવાળા પૃથ્વી વિગેરે રૂપના આલાપકમાં ત્રણ ઈન્દ્રિયવાળા જેને ઉત્કૃષ્ટ यस वध 'उक्कासेणं अलुत्तराईबे राईदियसयाइ' Gष्टथी मसे। भाई २०८ રાત દિવસ છે. આ કેવી રીતે થાય છે ? આ પ્રશ્નના જવાબમાં ઔત્રિક શ્રી ભગવતી સૂત્ર: ૧૫
SR No.006329
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 15 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1971
Total Pages969
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size57 MB
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