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प्रमेयचन्द्रिका टीका श०२० उ०५ सू०२ पुद्गलस्य वर्णादिमत्वनिरूपणम्
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कदुकश्च कषायश्च ४, कटु कश्च अम्लध ४, कटु कश्च मधुरश्च ४, कषायश्च अम्लश्च ४, कषायश्च मधुरश्च ४, स्थात् अम्लश्च मधुरश्च ४, एवमेते दशद्विकसंयोगाः भंगाः, पुनश्चत्वारिंशद् भवन्तीति। यदि त्रिरसस्तदा स्यात् तिक्तश्च कटुकश्च कषायश्च १। भंग कर लेना चाहिये 'स्यात् तिक्तश्च मधुरश्च' यहां पर भी तिक्त और मधुरता के एकत्व और अनेकत्व को लेकर ४ भंग पूर्वोक्त रूप से ही कह लेना चाहिये इसी प्रकार से स्यात् तिक्तश्च अम्लव' इन दो के संयोग में भी चार भंग इनके एकत्व और अनेकत्व को लेकर ४ भंग हुए हैं ऐसा जानना चाहिए इसी प्रकार से 'स्थात् तिक्तश्च मधुरश्च' यहां पर तिक्त और मधुर के मेल से एकत्व और अनेकत्व की अपेक्षा लेकर ४ भंग होते हैं ऐसा जानना चाहिये तथा कटुक और कषाय रस के मेल से इनकी एकता और अनेकता में भी ४ भंग होते हैं कटुक और अम्ल रस के मेल में इनकी एकता और अनेकता में ४ भंग होते हैं तथा कटु और मधुर रस के मेल में इनकी एकता और अनेकता को लेकर ४ भंग हुए हैं ऐसा समझना चाहिए इसी प्रकार से 'कषायश्च अम्लश्च ४ कषायश्च मधुरश्च ४' यहां पर भी ४-४ भंग हुए हैं तथा 'स्थात् अम्लश्च मधुरश्च ४' इस प्रकार के कथन में भी इनकी एकता
और अनेकता को लेकर ४ भंग हुए हैं ऐसा जानना चाहिए इस प्रकार से दश द्विक संयोग के ४-४ भेद होने से सब भंग मिलाकर ४० भंग ४. तथा 'स्यात् तितश्च मधु'श्च' तामा भने मधुर २सना ४५मा भने भने५९मा ५४ यार सग पूरित रीत सम सेवा से शत 'स्यात् तिक्तश्च अम्लश्च' ती मने पाट! २सना येसमा ५५ तना ५g! તથા અનેકપણાને લઈને ૪ ચાર ભંગ કહ્યા છે તેમ સમજવું. તેજ પ્રમાણે 'स्पात् तिक्तश्च मधुरश्च' माडियां पशु तीमा भने मधु२२सना पाभा तथा અનેકપણામાં ૪ ચાર અંગે કહ્યા છે તથા કડવા અને કષાય રસના રોગથી તેના એકત્વ અને અનેકપણામાં પણ ૪ ચાર ભંગ કહ્યા છે. કડવા અને ખાટા રસના વેગમાં તેને એકપણું અને અનેકપણાને લઈને ચાર ભંગ કહ્યા છે. તથા કડવા અને મધુર રસના રોગથી તેના એકપણ અને અનેક ५९याने सन २२ मा मन छ. म समन्यु. से शत 'कषायश्च अम्लश्च कषा यश्च मधुरश्च' षाय-तुरा मने पाटर २सना ५। भने अने. કપણાથી જ અંગે કહ્યા છે તથા કષાય-તુરા અને મધુર રસના એકપણામાં भने अनेमा यार भी समझा. तथा 'स्यात् अम्लश्च मधुरश्च४' माटा અને મધુર રસના એકપણમાં અને અનેક પણામાં ૪ ભંગ સમ જવા. આ
શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૧૩