SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 470
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ भगवतीसूत्रे णानि वक्तव्यानि न तु सर्वशरीरकरण सर्वस्य जीवस्येति । 'कइविहे गं भंते ! इंदियकरणे पन्नत्ते' कतिविधं खलु भदन्न ! इन्द्रियकरणं प्रज्ञप्तम् भगवानाह'गोयमा' इत्यादि, 'गोयमा' हे गौतम ! 'पंचविहे इंदियकरणे पन्नत्ते' पञ्चविधंपञ्चपकारकम् इन्द्रियकरणं प्रप्तम् इन्द्रियमेवकरम् , इन्द्रियस्य वा करणम् इन्द्रियेण वा करणम् , इन्द्रिये वा करणमिति, 'तं जहां तद्यथा-'सोइंदियकरणे' श्रोत्रेन्द्रिय करणम् । 'जाव फार्सिदियकरणे' यावत् स्पर्शनेन्द्रियकरणम् , अत्र यावत्पदेन घ्राणरसनचक्षुषामिन्द्रियाणां ग्रहणं भवति तथा च श्रोत्रेन्द्रियकरणघ्राणरसनचक्षुः इनके इन नाम के शरीरकरण होते हैं किसी २ छठे गुणस्थानवर्ती मुनिराज को तैजस कार्मण एवं औदारिकशबीर के साथ २ आहारकशरीर भी होता है इस कारण उनके इन नामके शरीरकरण होते हैं इस प्रकार सय जीवों को सब करण नहीं होते हैं ऐसा कहा गया है 'कइविहे गं भंते ! इंदियकरणे.' हे भदन्त ! इन्द्रियकरण कितने प्रकार का कहा गया है ? तो इस प्रश्न के उत्तर में प्रभु ने 'गोयमा ! पंचविहे इंदियकरणे पन्नत्ते' हे गौतम । इन्द्रियकरण पांच प्रकार को कहा गया है ऐसा कहा है-इन्द्रियरूप करण का नाम इन्द्रियकरण है अथवा इन्द्रिय का करनो या इन्द्रिय द्वारा करना या इन्द्रिय के होने पर करना ऐसी यह इन्द्रियकरण शब्द की व्युत्पत्ति है 'सोइंदियकरणे जाव फासिदियकरणे' इन्द्रियकरण के पांच प्रकार ऐसे हैं-श्रोत्रेन्द्रियकरण, यावत् स्पर्शनेन्द्रिय करण यहां यावत् शब्द से 'घाण, रसना और चक्षु' इन ३ इन्द्रियों શરીરની સાથે ઔદારિક શરીર હોય છે. તેથી તેઓને એ નામવાળા શરીર અને કરણ હોય છે. કઈ કઈ છઠ્ઠા ગુણસ્થાનમાં રહેવાવાળા મુનિરાજોને તૈજસ, કામણ અને દારિક શરીરની સાથે આહારક શરીર પણ હોય છે. તેથી તેઓને એ નામવાળા શરીર અને કરણ હોય છે. એ રીતે બધા જીવોને બધા કરણે હોતા નથી. તેમ કહેવામાં આવ્યું છે. 'काविहे ण भंते ! इंदियकरणे.' मगन् द्रिय४२६ मा प्रारना डेवामा भाव छ १ मा प्रश्न उत्तरमा प्रभु ४ छे है-'गोयमा ! पंचविहे इंदियकरणे पण्णत्ते' द्रिय४२९ पाय घारना डेस छ.-द्रिय३५ ४२७न नाम ઈદ્રિયકરણ છે. અથવા ઈદ્રિયનું કરવું તેનું નામ ઈદ્રિયકરણ છે. અથવા ઈદ્રિયદ્વારા કરવું અથવા ઈદ્રિના હોવાથી કરવું तनु नाम द्रिय४२५ छ. द्रिय४२५ शहनी व्युत्पत्ति छे. साइंदियकरणे जाव फासिदिय०' छद्रियाना पांय ५४२ २५॥ प्रभारी छ.-श्रोत्रन्द्रिय:२६ યાવત્ પ્રાણુઈન્દ્રિયકરણ, રસના ઈદ્રિય કરણ, ચક્ષુ ઈ દ્રિય કરણ રૂપેશ શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૧૩
SR No.006327
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 13 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1969
Total Pages970
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size58 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy