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________________ प्रमेयचन्द्रिका टीका श०१९ उ०३ सू०३ पृथ्वीकायिकानां सूक्ष्मत्वनिरूपणम् ३४९ सम्बबायरे' अकायः सर्वबादरः 'आउक्काए सबवायरतराए' अप्कायः सर्वबादरतरकः एषु त्रिषु सर्वथा बादरत्वमकायस्यैव इति भगवत उत्तरमिति ३। 'एयस्सणं भंते !' एतस्य खलु भदन्त ! 'वेउकाइयस्स वाउकाइयस्स' तेजस्कायिकस्य वायुकायिकस्य मध्ये 'कयरे काए सव्वबायरे' एतयोर्द्वयोमध्ये कतरः कायः सर्वबादरः ‘कयरे काए सम्बवायरतराए' कतरः कायः सर्ववादरतरकः अनयो योमध्ये सर्वापेक्षया अतिशयितबादरस्तेजस्काय एवेतिभावः ४ । पूर्वोक्तमेवार्थ प्रकारान्तरेण कथयभाह-'के महालए' इत्यादि । 'के महालए णं भंते !' कियन्महत् खलु भदन्त ! 'पुढवी सरीरे पन्नत्ते' पृथिवीशरीरं प्रज्ञप्तम् हे भदन्त ! पृथिवीकायिकस्य शरीरं कियन्महदिति प्रश्ना, भगवानाह-'गोयमा' इत्यादि । 'गोयमा' हे गौतम ! अणंताणं मुहुमवणस्सइकाइयाणं' अनन्तानां सूक्ष्मवायरे' हे गौतम! इन तीन जीवनिकायों में अपूकायिक ही सब की अपेक्षा बादर और अतिशयरूप में बादतर है अर्थात् इन तीन जीवनिकायों में सर्वथा वादरता अपकायिक में ही है। ___ अब गौतम प्रभु से ऐसा पूछते हैं-'एयरस णं भंते ! तेउकाइयस्स वाउकाइयस्स.' हे भदन्त ! तेजस्कायिक और वायुकायिक इन दो जीवनिकायों में कौन से जीबनिकाय में सर्वथा पादरता और बादरतरता है ? उत्तर में प्रभु कहते हैं-'गोयमा० !' हे गौतम ! इन दोनों जीवनिकायों के बीच में सर्वापेक्ष अतिशयवादर तेजस्काय ही है अब गौतम इसी बात को प्रकारान्तर से प्रभु से पूछते हैं-'के महालए ण भंते ! पुढवीसरीरे पन्नत्ते' हे भदन्त ! पृथिवीकायिक का शरीर कितना बडा कहा गया है ? इस प्रश्न के उत्तर में प्रभु कहते हैं-'अणंताणं सुहमधકાચોમાં અષ્કાયિક જ સર્વની અપેક્ષાએ બાદર અને અતિશય રૂપથી બાદરતર છે. અર્થાત્ આ ત્રણે જીવનિકામાં સર્વથા બાદરપણું અખાયિકમાં જ છે. व गौतम स्वामी प्रसुन मे पूछे छे -एयस्स गं भंते ! तेउकाइयास वाउकाइयस्स' सशव ४२४॥थि भने वायु४ि मा निकायमा કયા જવનિકાયમાં સર્વથી બાદરતારપણુ છે? આ પ્રશ્નના ઉત્તરમાં પ્રભુ કહે छ है-'गोयमा गौतम! मा ३०४ सन्न नियामा सपना અપેક્ષાથી અત્યંત બાદર તેજસ્કાયિક જ છે. હવે ગૌતમ સ્વામી આજ વાતને પ્રકારાતરથી પ્રભુને પૂછે છે કે'के महालए णं भंते ! पुढवी सरीरे पण्णत्ते' 3 मापन् पृथिवयितुं शरीर विma छ ? AL प्रश्न उत्तरमा प्रभु ४७ छ -'अणताण શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૧૩
SR No.006327
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 13 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1969
Total Pages970
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size58 MB
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