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________________ प्रमेयचन्द्रिका टीका श०१७ उ०८ सू०१ सौधर्मादिषु अप्कायिकोत्पत्तिनि० ५०५ टीका- 'आउकाहए णं भंते !' अझायिकः खलु भदन्त ! 'इमीसे रयणपभाए पुढवीए' एतस्यां रत्नप्रभापृथिव्याम् ‘समोहए' समवहतः, 'समोहणित्ता' समवहत्य-मारणान्तिकसमुद्धात कृत्वा योऽपकायिकः 'मोहम्मे कप्पे' सौधर्मे कल्पे 'आउकाइयत्ताए' अपूकायिकतया-अप्कायिकस्वरूपेणेत्यर्थः "उववज्जित्तए' उपपत्तुम् 'भविए' भव्यः योग्यः, हे भदन्त ! योऽप्रकायिको जीवोऽस्यां रत्नप्रभायां पृथिव्याम् मारणान्तिकसमुद्घात कृत्वा सौधर्मकल्पे अपकायिक स्वरूपेण उत्पत्तियोग्यो विद्यते स जीवः किं पूर्वमुत्पद्य पश्चात् पुद्गलग्रहणं करोति ? अथवा पूर्व पुद्गलग्रहणं कृत्वा पश्चात् उत्पद्यते ? इति पूर्वप्रकारेण इहापि प्रभा करणीयः । उत्तरेऽतिदेशमाह-एवं जहा' इत्यादि एवं जहा पुढवीकाइओ' एवं यथा पृथिवीकायिको जीवः 'तहा आउकाइओ वि सम्यकप्पेसु तथाऽपकायिको टीकार्थ--इस सूत्र द्वारा गौतम ! ने प्रभु से ऐसा पूछा है-'मते' हे भदन्त ! 'आउकाइए णं' जो अप्कायिक जीव 'इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए समोहए' इस रत्नप्रभापृथिवी में मारणान्तिक समुद्घात करता है और 'समोहणित्ता 'मारणान्तिक समुद्घात करके 'जे भविए सोहम्मे कप्पे आउकाइयत्ताए उववज्जित्तए भविए' सौधर्मकल्प में अप्कायिकरूप से उत्पन्न होने के योग्य है, तो ऐसा वह अपकायिक जीव क्या पहिले उत्पन्न होकर बाद में आहार पुद्गलों को ग्रहण करेगा ? या पहिले आहार पुद्गलों को ग्रहण कर बाद में वहां उत्पन्न होगा? उत्तर में प्रभु कहते हैं। एवं जहा.' हे गौतम ! जैसा कथन पृथिवीकायिक जीव के उपपात होने में किया जा चुका है, उसी प्रकार का कथन अपकायिक जीव के सौधर्मादिकल्पों में और ईषत्प्रारभारापृथिवी में उत्पन्न At-- सूत्रथी गौतमत्वामी प्रभुने मे ५७यु भते!' सावन 'आउकाइए णं' २ मयि "इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए समोहए' या २त्नप्रसीमा भारयन्ति समुद्धात रे छ, भने त 'समोहणित्ता' भाति समुद्धात शने 'सोहम्मे कप्पे बाउकाइयत्ताए उवव. ज्जित्तए' सौधम ६५मा २५४५४५४ाथी उत्पन्न थवा छे सेवा तमયિક જીવ પહેલાં ઉત્પન્ન થઈને તે પછી આહાર પલેને ગ્રહણ કરશે ? અથવા પહેલાં આહાર પુદ્ગલોને ગ્રહણ કરીને તે પછી ત્યાં ઉત્પન્ન થશે? मा प्रशना उत्तरमा प्रभु ४९ छ -'एवं जहा', गौतम पृथ्वीयि: 4 8५५ात (उत्पत्ति) ना विषयमा २४थन युछे. ते प्रमाणेनु કથન અપકાયિક જીવના સૌધર્મકલ્પ વિગેરે કારમાં અને ઈષત્રાગભાશ (સિદ્ધશિલા) પૃથ્વીમાં ઉત્પન્ન થવાના વિષયમાં સમજી લેવું. અહિયાં યાવત भ० ६४ શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૧૨
SR No.006326
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 12 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages710
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size41 MB
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