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________________ ममेयचन्द्रिकाटीका श.७ उ.६५.३ भाविभारतवर्षावस्थास्वरूपनिरूपणम् ५४७ कवट-मडम्ब-द्रोणमुख-पत्तनाऽऽश्रमसंत्राहसंनिवेशगतं जनपदम् , चतुष्पद-गवेलकान्, खेचरान् पक्षिसंवातान, प्रामारण्याचारनिरतान् वसांश्च प्राणान, यहुपकारान वृक्षगुच्छ-गुल्म-लता-वल्ली-तृण-पर्वक हस्तिौषधि-प्रबाला करादींश्च वणवनस्पतिकायिकान् विध्वंसयिष्यन्ति, पर्वत गिरि-शिलोच्चय-उत्स्थल-भ्राष्ट्रादींश्च वैताढयगिरिवनितान् विद्रावयिष्यन्ति, सलिलबिल-गत-दुर्ग-विषम-निम्नोन्नतानि च गङ्गासिन्धुवर्जितानि समीकरिष्यन्ति । तस्यां खलु समायां भारतवर्षस्य भूमेः कीदृशः (जेणं भारहेवासे गामाऽऽगर-नगर-खेड-कव्वड-मडंबदोणमुह-पट्टणा समसंवाहसंनिवेसगयं जणवय, चउप्पयगवेलए, खयरे, पक्खिसंघे,गामारनपयारनिरए तसेय पाणे, बहुप्पगारे रुक्वगुच्छा-गुम्मलय वल्लितण पन्वयग हरितोसहिपवालंकुरमादीए य तणवणस्सइकाइए विद्धंसेहिति) जिससे भारतवर्ष में ग्राम, आकर, नगर, खेट, कर्षट, मडंब, द्रोणमुख, पट्टण और आश्रम संवाह और संनिवेश इनमें रहा हुआ मनुष्य समूह, चतुष्पद महिषी आदि, गवेलकगाय, मेष खेचर पक्षी तथा ग्राम एवं जंगलमें चलते हुए सजीव, अनेकमकारके वृक्ष, गुल्म, लताएँ, बेले, घास, इक्षु, दुर्वा, औषधियां, प्रवाल, अङ्कुर, एवं तृण, वनस्पतियां ये सब नष्ट हो जावेंगी। (पव्यय-गिरि-डोंगर - उत्थल-भट्टिमाईए य वेयड्ढ गिरिवज्जे विरावेहिति) वैताढथं पर्वतको छोडकर वाकीके सब पर्वत, गर, धुलके ऊँचे स्थल, धूलि रहित स्थान ये सब भी नष्ट हो जावेंगे । (सलिल-बिल-गड्ड-दुग्ग-विसम निण्णुन्नयाइं च गंगा सिंधु वजाई समीकरें हिंति) गंगा और सिंधु नदी को छोडकर बाकी के हो भने अत्यात पाणी पायी युत उश. (जे णं भारहे वासे गामाऽऽगर नगर-खेड-कबड-मडब-दोणमुह-पट्टणा-समसंवाहसंनिवेसगय जणवयं, चउप्पथ-गवेलए, खहयरे, पक्खिसंघे, गामारनपयारनिरये तसेय पाणे. बहुप्पगारे रुक्स-गुच्छा, गुल्मलय, वल्ली, तणपव्ययग, हरितासहिपवालं कुरमादीए वे तणवणस्सइकाइए विद्ध सेहिति) ने णे मरताना गाभ, २।४२, नगर, भेट, ४५, મર્ડબ, દ્રોણમુખ, પટ્ટણ અને આશ્રમસંવાહ અને સંનિવેશમાં રહેલા જનસમૂહને પણ નાશ થશે ગાય, ભેંસ, ઘેટાં આદિ ચેપમાં જાનવરે, ખેચર (પક્ષી), ગામ અને વનમાં ફરતાં ત્રણ છ વગેરેને પણ નાશ થશે. અનેક પ્રકારનાં વૃક્ષ, ગુલ્મો, લતાઓ, વેલે ઘાસ, ઈક્ષુ (२२), हुवा (), मेषधिया, प्रवास, मधु, तृ मा वनस्पतियाना नाश 45 श. (पव्यय, गिरि, डांगर, उत्थल, भट्टिमाईए य वेयढगिरिवज्जे विरावेहिति) वाढय पत सिवायना पाश्रीन समस्त पंचता, गिरि, २, धूजना भनेता टेरामा, मने धूडित स्थानाने ना थशे. (सलिल-बिल-गड-दुग्गविसम निष्णुम्नयाई च गंगासिंधुवज्जाइं समीकरहिं ति ) nt भने सिंधु શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૫
SR No.006319
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 05 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1963
Total Pages866
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size47 MB
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