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________________ २६२ भगवती सूत्रे देवौ! एवं खलु मम सप्त अन्तेवासिशतानि यावत् - अन्तं करिष्यन्ति । ' तरणं अम्हे समणेण भगवया महावीरेणं मगसा चेत्र पुट्ठेणं ' ततः खलु आवां श्रमणेन भगवता महावीरेण मनसैव पृष्टेन सता च ' मणसा चैव इमं एयारूवं वागरणं वागरिया समणा' मनसैव इदम् एतद्रूपम् उपर्युक्तस्वरूपं व्याकरणम् उत्तरवाक्यं व्याकृतौ प्राप्नुवन्तौ सन्तौ ' समणं भगवं महावीर बंदामो, नम॑सामो ' श्रमणं भगवन्तं महावीर वन्दा, नमस्यात्र: ' वंदित्ता नमसित्ता, जात्र- पज्जुवासामो त्तिक' वन्दित्वा नमस्थित्वा यावत् पर्युपास्त्र इति कृत्वा इत्येवंप्रकारेण उक्त्वा 'भगव' गोयमं बंदंति, नर्मसंति, ' भगवन्तं गौतम् इन्द्रभूतिम् वन्देते, नमस्यतः, 'वंदित्ता, जामेव दिसं पाउन्भूया तामेव दिसं पडिगया' बन्दित्वा, नमस्यित्वा यामेव दिशम् आश्रित्य प्रादुर्भूतौ तामेव दिशं प्रतिगतौ प्रतिनिवृत्तौ ।।०५। , " कर्मोंका नाश करेंगे । 'तरणं अम्हे ' इसके पश्चात् हम दोनों ने 'मणसा चेव पुढेणं समणेणं भगवया महावीरेण ' मन द्वारा पूछे गये श्रमण भगवान् महावीर से मणसा चेव इमं एयारूवं वागरणं वागरिया समाणा उनके मनद्वारा प्रदत्त इस प्रकार के उत्तर प्राप्तकर समणं भगवं महावीरं श्रमण भगवान् महावीर को 'वंदामो नमसामो' बन्दनाकी उन्हें नमस्कार किया ' वंदित्ता नमसित्ता ' वंदना नमस्कार करके 'जाव पज्जु सामो' यावत् उनकी पर्युपासना-सेवाकी । इस प्रकार कहकर उन दोनोंने 'भगव' गायमं ' भगवान् गौतम को वदंति नमसंति ' वंदना की और नमस्कर किया ! फिर वे वंदित्ता नमंसित्ता' पुनः वंदना नमस्कार कर जामेव दिसिं पाउन्भूया तामेव दिसिं पडिगया ' जिस दिशा से आये थे, उसी दिशा की ओर चले गये || सू० ५ ॥ થશે અને સમસ્ત કર્મીને સપૂર્ણ ક્ષય કરીને મેક્ષધામનું અનત સુખ ભેગાશે. "तरण' अम्हें मणसा चेव पुट्ठेगं मणसा चेत्र इम एयारूवं वागरण' वागरिया समाणा આ રીતે અમારા દ્વારા મનથી જ પૂછાયેલા અને ભગવાન મહાવીર द्वारा मनश्री सायवामां आवेला उत्तर सांभणीने, " समण भगव' महावीर " सभे श्रमशु लगवान महावीरने “वंदामो नमसामो " हारी अने नमस्सार हर्षा "व दित्ता जाव पज्जुत्रासामो" वहा नमस्कार पुरीने समे तेमनी सेवालस्ति छुरी.” रमा प्रमाणे उडीने ते भन्ने हेवाये "भगव गोयम वदंति नमसंति” भगवान गौतमने वह पुरी भने नमस्कार . "वदित्ता नमः सित्ता जामेव दिसि पाउन्भूया तामेव दिसि पडिगया " वडा नमस्कार ने, दिशाभांथी यान्या देता ते हिशामां पाछा थाया गया. ॥ सू. ५ ॥ ܕ श्री भगवती सूत्र : ४
SR No.006318
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 04 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1963
Total Pages1142
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size65 MB
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