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________________ ४५२ 6 भगवतिसूत्रे rafaज्ञानोपयोगेन 'आभोएइ' आभोगयति परिपश्यति परिदृश्य च हा ! हा ! अहो ! हतो अहमंसि' हा हा अहो ! इति महादुःखं हतोऽहमस्मि हा ! हा ! इति वारद्वयप्रयोगेणातिशयखेदः अहो ! इति शब्देन अतिदुःखं सूच्यते, तदाह - हतोऽहमस्मि हा ! हतोऽस्म्यहम् महती अनर्थ संभावना 'त्तिकद्दु' इति कृत्वा विचार्य 'ताए उक्किद्वार' तथा पूर्वोक्तया उत्कृष्टया 'जाव - दिव्वाए देवगईए' यावत् - दिव्यया देवगल्या, यावत्करणात् ' त्वरितया चपलया ' इत्यादि संग्राह्यम् ' वज्जस वीहीं' वज्रस्य वीथिम् वज्रगमनमार्गम् 'अणुगच्छमाणे' अनुगच्छन् वज्रमादातु मनुसरनन् ' तिरियमसंखेज्जाणं दीवसमुद्दाणं मज्झ मज्झेणं' तिर्यगसंख्येयानाम् द्वीपसमुद्राणां मध्यं मध्येन 'जाव - जेणेव' यावत्एइ' देखा और देखकर के 'हा ! हा ! अहो ! हतो अहमंसि' अरे ! यह तो बड़े दुःख की बात हुई है - मैं तो मारा गया - 'हा हा ' ये खेद सूचक अव्यय हैं । इनके दो बार प्रयोग करने से शक्र को महा दुःख हुआ यह प्रकट होता है 'हतोऽस्म्यहम् ' इस से वह शक्र 'महती' अनर्थ होने की संभावना है' ऐसा मान रहा है । 'चिकट्टु' ऐसा विचार कर 'ताए उक्किट्टाए' वह शक्र उस पूर्वोक्त उत्कृष्ट 'जाव दिव्वाए देवगईए' यावत् दिव्य देवगति से - यावत् शब्द लभ्य त्वरित एवं चपल आदि विशेषणों वाली देवगति से - ' वज्जस्स वीहिं' वज्र जहां से होकर गया था उसी मार्ग से होकर 'अणुगच्छमाणे' वज्र को पकड़ने के लिये चला मार्ग में आये हुए 'तिरियमसंखेज्जाणं दीव समुदाणं' तिरछे असंख्यात द्वीप समुद्रो के 'मज्झं मज्झेणं' ठीक અવધિજ્ઞાનથી જોયો કેહેવાનું તાત્પ એ છે કે અધિજ્ઞાનના ઉપયોગ કરીને તેણે જોયુ કે ચમરેન્દ્રે મહાવીર ભગવાનના આશ્રયથી સૌધમ દેવલાકમાં આવવાની હિંમત कुरी हुती. त्यारे तेना भुमभांथी भावा उगारो नीडजी पडया 'हा ! हा ! अहो ! हतो अहमंसि' भरे ! या तो भारे दुःमनी बात मनी. हुवे भाई भावा मन्युं ! 'हा ! हा' मे मेहहर्श' अव्यय छे. तेनेो मे वार प्रयोग पुरीने शहनुं भडाहुःअ अट यु छे. 'हतो अहमंसि ' या शब्दप्रयोग द्वारा शहुने 'अ महान मनर्थ थवानी शम्यता लागे छे,' मेनुं वे छे. 'त्तिकद्दु' मेवे विचार ने 'ताए उक्किए' 5 तेनी उत्कृष्ट माहि विशेषाणोथी युक्त हिव्य देवगतिथी 'वज्जस्स वीहिं' ने भार्गथी व यु' हेतु ते मार्गे' 'अणुमच्छमाणे' तेनी पाछा पडयो. वभने पथ्येथी पडी सेवा भाटे तो तेन। पीछे पडडयो. 'तिरियमसंखेजाणं दीवसमुद्दाणं' भारीते तेना पीछे पडतां भार्गमां भावेला तिरछा असण्यात શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૩
SR No.006317
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 03 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1963
Total Pages933
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size52 MB
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