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________________ विषय १ तृतीय उद्देशके साथ चतुर्थ उद्देशका संबंधकथन, प्रथम सूत्रका अवतरण, प्रथम सूत्र और छाया । [42] ॥ अथ चतुर्थ उद्देश | २ आचार्यद्वारा परिश्रमपूर्वक शिक्षित किये गये उन शिष्यों में से कितने अहंकारयुक्त हो कर उपशमको छोड गुरुजनोंके साथ भी कठोर व्यवहार करते हैं । ३ द्वितीय सूत्रका अवतरण, द्वितीय सूत्र और छाया । ४ कितनेक शिष्य ब्रह्मचर्य में रह कर भी, भगवान्की आज्ञा आराधना सर्वथा तत्पर नहीं हो कर देशतः भगवान् की आज्ञाकी अवहेलना करते हुए सातागौरवकी अधिकता से बाकुशिक हो जाते हैं । ५ तृतीय सूत्रका अवतरण, तृतीय सूत्र और छाया । ६ कितनेक शिष्य, आचार्यद्वारा कुशीलाचार के विपाकका प्रतिपादन करनेपर, उन आचार्यों के ऊपर ही क्रुद्ध हो जाते हैं । ७ चतुर्थ सूत्रका अवतरण, चतुर्थ सूत्र और छाया । ८ ये अवसन्न पार्श्वस्थादि, शीलवान् उपशान्त और हेयोपादेय ज्ञानपूर्वक संयममार्ग में प्रवृत्ति करनेवाले साधुओंको 'चारिहीन ' कहा करते है, यह उनकी द्वितीय बालता है, पहली बालता तो इनकी यह है जो ये स्वयं भ्रष्ट हैं । ९ पञ्चम सूत्रका अवतरण और पञ्चम सूत्र । १० कितनेक स्वयं संयमाचरणमें असमर्थ होते हुए भी मूलगुण और उत्तरगुणकी शुद्ध रूपसे व्याख्या करते हैं, उनको द्वितीय बालता नहीं होती है । षष्ठ सूत्रका अवतरण, षष्ठ सूत्र और छाया । ११ શ્રી આચારાંગ સૂત્ર : ૩ पृष्ठाङ्क ३१५ ३१५-३१६ ३१७ ३१७ ३१८ ३२०-३२१ ३२१-३२२ ३२२ ३२२ ३२३
SR No.006303
Book TitleAgam 01 Ang 01 Aacharang Sutra Part 03 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1957
Total Pages719
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_acharang
File Size37 MB
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