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परिवार में माता का असीम मधुर स्नेह तथा पिता का कठोर शिक्षाप्रद अनुशासन-इन दोनों से बालक के व्यक्तित्व का निर्माण होता है। परिवार ही बालक का प्रथम विद्यालय होता है। कुछ बड़ा होने पर बालक जब विद्यालय जाता है तो योग्य गुरु-जनों के सान्निध्य में रह कर विद्याध्ययन व ज्ञानार्जन करता है। बालक को जन्म देने और उसके लालन-पालन में माता-पिता को जो क्लेश उठाना पड़ता है, उससे उर्ऋण होना कभी संभव नहीं। किन्तु गुरु की महत्ता भी माता-पिता से कम नहीं होती। गुरु को ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर एवं परब्रह्म के समकक्ष मान कर, उसे वन्दनीय व सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। वैदिक व जैन- इन दोनों धर्मों में भी इन तीनों की पूज्यता व महनीयता को समान रूप से निरूपित किया गया है।
- (1) अम्मापिऊ-सुस्सूसगा...।
(औपपातिक सूत्र-71) -माता-पिता की सेवा करने वाले (भद्रप्रकृति के) सुपुत्र हैं।
(2)
न ह्यतो धर्मचरणं किंचिदस्ति महत्तरम्। यथा पितरि सुश्रूषा तस्य वा वचन-क्रिया॥
(वाल्मीकि रामायण-2/19/22)