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जो मनोविकार आत्मा को अपवित्र बनाते हैं, उसकी ज्योति को धूमिल करते हैं,वे अधर्म हैं। इसके विपरीत, धर्म वह है जो आत्मा की पवित्रता व शुद्धता व निर्विकारता का संवर्धन करता है। इसी चिन्तन के परिप्रेक्ष्य में सरलता, निष्कपटता 'धर्म' हैं तो कुटिलता,माया व कपटता से भरा आचरण 'अधर्म' है। वैदिक व जैन- इन दोनों धर्मों ने उक्त सत्य पर अपनी पूर्ण सहमति व्यक्त की है।
(1) सोही उज्जुयूयस्स, धम्मो सुद्धस्स चिट्ठई।
(उत्तराध्ययन सूत्र-3/12) -ऋजु/सरल आत्मा शुद्धि की ओर बढ़ता है। धर्म शुद्ध आत्मा में ही ठहरता है।
(2) आर्जवं धर्ममित्याहुरधर्मो जिह्म उच्यते।
(महाभारत- 13/142/30) - आर्जव-सरलता धर्म है और कुटिलता अधर्म। 0m
धार्मिक होने की प्राथमिक योग्यता निष्कपटता व सरलता है-इस तथ्य को वैदिक व जैन, दोनों धर्मों ने समान रूप से स्वीकार किया है।
नम 101
मामला 400P