________________
(3)
सुत्ता अमुणी, मुणिणो सया जागरन्ति।
(आचारांग सूत्र-3/10) -अमुनि (असंयमी) सदा सोते हैं, मुनि सदा जागते रहते हैं।
(4) या निशा सर्वभूतानां,तस्यां जागर्ति संयमी।
(गीता-2169) - जो अन्य प्राणियों के लिये रात्रि है, आत्म-दृष्टि संयमी के लिये वही जागरण-वेला है।
000
अज्ञान व असंयम निद्रा है, सम्यक ज्ञान व संयम में अप्रमाद ही जागृति है। निद्रा छोड़ने और जाग कर आत्मकल्याण में यथाशीघ्र तत्पर हो जाने के लिए वैदिक व जैन- इन दोनों धर्मों के आचार्यों ने समान रूप से तथा एक स्वर से उपयोगी उदबोधन दिया है।
तीय वायु,453