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(6) (संगत्यक्त्वा) लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा।
(गीता-5/10) - जिस प्रकार पानी में कमल निर्लिप्त रहता है, उसी प्रकार निरासक्त व्यक्ति पाप-लिप्त नहीं होता।
(मनोनिग्रह)
(7)
मणो साहसिओ भीमो, दुट्ठस्सो परिधावई। तं सम्मं तु निगिण्हामि, धम्म-सिक्खाइ कन्थगं॥
(उत्तराध्ययन सूत्र-23/58) __ -मन साहसिक और भयंकर है, दुष्ट घोड़े की तरह इधर-उधर दौड़ लगाता है। धर्म-शिक्षा की लगाम डालकर मैं उसे अच्छे घोड़े की तरह वश में लाता हूँ।
(8) मणुस्साहिदयं पुणिणं गहणं दुब्वियाणकं।
___ (इसिभासियाई 1/8) - मनुष्य का हृदय (मन) बड़ा गहरा होता है, इसे नियंत्रित कर पाना बड़ा कठिन होता है।
(9) चञ्चलं हिमनः कृष्ण, प्रमाथि बलववढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये, वायोरिव व सुदुष्करम्॥
(गीता-6/35) - हे कृष्ण! मन बहुत चंचल है, मनुष्य को मथ डालता है, बड़ा बलवान् है। जैसे वायु को दबाना कठिन है, वैसे ही मैं मन को वश में करना बहुत कठिन मानता हूं।
तीय गाड +7