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________________ भी उस विष को पी लिया। उसकी ईश्वर-भक्ति की शक्ति ने विष को अमृत में बदल दिया। सोमा को मारने के लिए उसके पति ने एक घड़े में कृष्ण सर्प रोककर उसे दिया। अपने इष्ट परमेष्ठी देव का ध्यान करते हुए सोमा ने घड़े में हाथ डाला तो विषधर सर्प फूलों की माला के रूप में बदल गया। पति और परिवार सोमा की शक्ति के समक्ष झुक गए। जैन और वैदिक साहित्यों से लिए गए दोनों कथानकों में पूर्ण साम्यता प्राप्त होती है। नारी की गरिमा, महिमा, समतापूर्ण भाव और भयावह कष्ट के क्षणों में उसकी अपने लक्ष्य पर अकंप अडोलता का दर्शन दोनों धाराओं में एक रूप-एक स्वर से स्वीकृत किए गए हैं। दोनों कथानकों में संकटग्रस्त नारी-दशा का चित्रण किया गया है। एक परिवार में नारी को कितने कष्ट झेलने पड़ जाते हैं- यह दोनों कथानकों में देखा जा सकता है। इसके साथ सम्प्रदायवाद कितना भयवाह हो जाता है, वह कैसे परिवारों को तोड़ देता है-यह भी देखा जा सकता है। तीसरी बात जो द्रष्टव्य है, नारी को अबला कहा जाता है, लेकिन नारी की दृढ आस्था एवं अनुपम सहनशक्ति वास्तव में अद्भुत होती है। उसे न तो राज-सत्ता ही डिगा सकती है और न मृत्यु का भय ही विचलित कर सकता है। धन्य हैं ऐसी सन्नारियां, और धन्य है उनकी दृढ आस्था। जैन व वैदिक- दोनों विचारधाराओं ने नारी की उक्त क्षमता को पहचान कर, इन कथानकों के माध्यम से उसका निदर्शन कराया है। द्वितीय सण्ड323
SR No.006297
Book TitleJain Dharm Vaidik Dharm Ki Sanskrutik Ekta Ek Sinhavlokan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSubhadramuni
PublisherUniversity Publication
Publication Year2008
Total Pages510
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size31 MB
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