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निकट ही एक स्वच्छ जल से पूरित एक कमल सरोवर था । उस सरोवर में एक बलशाली ग्राह रहता था। वह ग्राह भी पूर्व में हूहू नामक गंधर्व था । वह भी एक ऋषि के शाप के कारण मकर योनि भोग रहा था ।
एक बार गजराज हथिनियों के साथ त्रिकूट के उस सरोवर में जल-विहार कर रहा था । हस्ति-समूह के जल-प्रवेश से शान्त सरोवर अशान्त हो गया। इससे ग्राह क्रोधित हो उठा। उसने गजराज को पकड़ लिया । गजराज को अपने बल पर घमण्ड था । सो वह भी ग्राह से उलझ गया । गज और ग्राह के मध्य युद्ध होने लगा ।
कहावत है- जल में रहकर मगर से वैर मृत्यु का ही कारण बनता है । फिर वह तो बलशाली ग्राह था । उसके बल के समक्ष हाथी का बल थक गया । ग्राह गज को गहरे जल में खींच ले गया । गज की आंखों में मृत्यु का भय झलक उठा । उसने ग्राह से छूटने की लाख कोशिश की, परन्तु सब व्यर्थ । गज के सूंड का अग्रभाग ही जल से बाहर बचा था। बस प्राण गए - यह नौबत आ पहुंची थी । गज ने निर्बल के बल राम - भगवान् का स्मरण आर्त्त भाव से किया । भागवत पुराण में बताया गया है- जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम् (भागवत पु. 8/3/1) अर्थात् गजेन्द्र को संकट की इस घड़ी में प्रभु का मन्त्र स्मरण हो आया जो उसने पूर्वजन्म में सीखा था । उस परम मन्त्र का जप उसने प्रारम्भ किया । यह मन्त्र प्रभु-वन्दना रूप ही है, जिसका प्रारम्भ 'नमो भगवते' इस पद से होता है (द्रष्टव्यः भागवत - 8 / 3 / 2 ) ।
आर्त्त भक्त की पुकार सुनते ही भगवान् दौड़ पड़े । ग्राहको मार कर गज की प्राणरक्षा की । ग्राह अपने दिव्य रूप को प्राप्त कर गंधर्व लोक में गया। इस तरह भक्त गजराज की पुकार सार्थक हुई।
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द्रौपदी की रक्षा (वैदिक)
द्रौपदी महाराजा द्रुपद की पुत्री थी । उसका विवाह अर्जुन
से हुआ था । वैदिक और जैन- इन दोनों परम्पराओं में वह महासती स्वीकार की गई है। पांच महान् बलशाली पाण्डुपुत्रों के सम्मुख और
द्वितीय खण्ड / 217