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[२] वासुदेव श्रीकृष्ण
(वैदिक) धृतराष्ट्र के पुत्र-मोह की तलवार ने हस्तिनापुर साम्राज्य को दो खण्डों में विभक्त कर दिया। पाण्डवों को खाण्डवप्रस्थ का भूभाग प्राप्त हुआ। अपने परिश्रम और पराक्रम से पाण्डवों ने इन्द्रप्रस्थ नामक सुन्दर नगर बसाया। नगर के मध्य में बना राजमहल अतीव भव्य और चमत्कारिक कलाओं से युक्त था।
__महल के उद्घाटन/प्रवेश-दिवस पर महाराज युधिष्ठिर ने अनेकों राजाओं महाराजाओं, ऋषियों और पारिवारिक बन्धु-बान्धवों को आमंत्रित किया। वासुदेव श्रीकृष्ण इस समारोह के मुख्य अतिथि थे।
भोज का आयोजन चल रहा था। श्रीकृष्ण युधिष्ठिर के पास आए और बोले-"बड़े भैया! सभी लोग किसी न किसी कार्य में जुटे हुए हैं। मैं खाली हूं। मुझे भी कोई कार्य बताइए।"
“वासुदेव!'' युधिष्ठिर ने अत्यन्त विनम्रता और प्रेम से कहा"आप तो पूज्य हैं। राजाधिराज वासुदेव सम्राट हैं। आप सिंहासन पर विराजिए। आपके श्रीचरण तो सेव्य हैं।"
युधिष्ठिर का उत्तर सुनकर श्रीकृष्ण सन्तुष्ट नहीं हुए। वे सबकी आंख बचाकर उस स्थान पर पहुंचे जहां पंक्तियों में बैठे ऋषि जन और साधारण जन विराजमान थे। उन्होंने सभी के चरण धोए। उन्होंने देखाकोई सब्जी परोस रहा है, कोई रोटी तो कोई मिष्टान्न । सम्पूर्ण कार्य उचित विधि से चल रहा है। तभी उन्होंने देखा- जूठी पत्तलें उठाने वाला वहां कोई नहीं है। फिर क्या था- त्रिखण्डाधीश वासुदेव श्रीकृष्ण जूठी पत्तलें उठा-उठा कर बाहर यथास्थान डालने लगे।
__बहुत समय तक श्रीकृष्ण को न देखकर पाण्डव चिन्तित हुए। उन्हें खोजते हुए वे भोजशाला की ओर आए। श्रीकृष्ण को जूठी पत्तलें उठाते देख कर पाण्डव सन्न रह गए। युधिष्ठिर कुछ बोल न पाए। अर्जुन ने दौड़कर श्रीकृष्ण के चरण पकड़ लिए और बोले-“वासुदेव! आप यह क्या कर रहे हैं? इस कार्य के लिए अन्य अनेक सेवक हैं।"
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जैन धर्म एवं वैदिक धर्म की सांस्कृतिक एकता/146
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