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NG DA दया : धर्म का मूल है SAG
( सांस्कृतिक पृष्ठभूमिः)
संत कवि तुलसीदास ने कहादया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान ।
तुलसी दया न छांड़िए, जब तक घट में प्रान ॥
धर्म का मूल दया है। दयारहित धर्म 'धर्म' नहीं हो सकता है।
दया हृदय की कोमलता और मृदुता की पहचान है। मृदु हृदय से दया का उत्स फूटता है । महान् नीतिज्ञ चाणक्य ने कहा- "दया धर्मस्य जन्मभूमिः ।” दया ही धर्म की जन्मभूमि है ।
सन्त मलूकदास ने दया के बिना सभी तीर्थों को असत्य घोषित करते हुए कहा था
मक्का मदीना द्वारिका, बद्री और केदार ।
बिना दया सब झूठ है, कहे मलूक विचार ॥
दया का एक अन्य पर्यायवाची शब्द है- अनुकम्पा । इस शब्द में दया का सम्पूर्ण भाव निहित है। अनुकम्पा का अर्थ है- कंपित को देखकर कंपित होना । दुःखी के दुःख से दुःखित हो जाना ही अनुकम्पा है । पीड़ित या कष्ट-कवलित को देखकर जो दयार्द्र नहीं होता अथवा उसका कष्ट हरने के लिए लालायित नहीं होता, वस्तुतः वह न तो धार्मिक है और न ही उसे 'मनुष्य होने का अधिकार है। सच्चे अर्थों में दयालु तो वह है जो अपने
द्वितीय खण्ड 125