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बुद्ध-मुक्त होते हैं (द्रष्टव्यः तिलोयपण्णत्ति-4/1473) और आराध्य कोटि में आते हैं। इन 54 महापुरुषों में भी 'बलदेव' महापुरुष नियमतः 'ऊर्ध्वगामी' होते हैं अर्थात् इनका कभी अधःपतन नहीं होता (द्र. समवायांग-663/67, हरिवंश पुराण- 6/293, तिलोयपण्णत्ति- 4/436)। जैन परम्परा श्रीराम को इन्हें बलदेव-महापुरुषों में परिगणित कर एक असाधारण महापुरुष मानती है।
भगवान् राम के व्यक्तित्व को व्याख्यायित करने वाली कुछ जैन मान्यताएं यहां प्रस्तुत हैं:
जैन परम्परा के अनुसार, 2 वें तीर्थंकर मुनि सुव्रत के शासन (धर्म-प्रवर्तन)- काल में 8 वें बलदेव के रूप में 'श्रीराम' का जन्म हुआ था। इनका वास्तविक नाम 'पद्म' था (तिलोयपण्णत्ति-4/517)।
जैन पुराणों में इन्हें 'राम' नाम से भी अभिहित किया गया है (द्र. पद्मपुराण-74/31, उत्तरपुराण-69/731 आदि)।
•इनका अवतरण (च्यवन) स्वर्गलोक से हुआ था (द्र. पद्मपुराण-2/236, उत्तरपुराण-68/731)।
इनके छोटे भाई लक्ष्मण जैन परम्परा में 'नारायण' नाम से अभिहित किये गए हैं, जिन्हें 8 वें वासुदेव के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है। पद्म (राम) और नारायण (लक्ष्मण)- ये दोनों एक ही पिता दशरथ के पुत्र थे और परस्पर भाई थे। इनमें पद्म (राम) बड़े थे (द्र. पद्मपुराण- 2/214, समवायांग- 667/67)।
.ये असाधारण सौन्दर्य के साथ-साथ असाधारण/ अपराजेय शक्ति से भी सम्पन्न थे। दया, करुणा, धीरता, सौम्यता के साथ-साथ अद्भुत वीरता की भी ये प्रतिमूर्ति थे। इन्हें सूर्य के समान तेजस्वी तथा देवराज इन्द्र की तरह अप्रतिहत राज्य-लक्ष्मी का अधिपति माना गया है। भारत के आधे भाग यानी तीन खण्डों का अधिपति होने से इन्हें अर्धचक्री कहा गया है (द्र.समवायांग667/67)।
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धर्मसारक ता/1101