________________
निष्कर्षतः अवतारों की आराधना-उपासना प्रकारान्तर से (समष्टि) आत्म-उपासना ही है। इसी भाव को जैनाचार्य कुन्दकुन्द ने इस प्रकार व्यक्त किया है:
एवं हि जीवराया णादव्यो तह य सद्दहेदव्यो। अणुचरिदव्यो य पुणो सो चेव दु मोक्खकामेण॥
। (समयसार-18) -अर्थात् मोक्षार्थी के लिए (परमशुद्ध) आत्मा ही ज्ञातव्य है, श्रद्धानयोग्य है और वही अनुष्ठेय- आचरणयोग्य है। जिनवाणी भी स्पष्ट उद्घोष करती है
संपिक्खए अप्पगमप्पएणं।
(दशवैकालिक सू. चूलिका- 2/12) अर्थात् स्वयं अपनी आत्मा द्वारा आत्मतत्त्व का संप्रेक्षणनिरीक्षण करें, साक्षात्कार करें।
(सुद्धात्म तत्त्व के प्रतीक : पांच परमेष्ठी:-)
जैन परम्परा में अर्हन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय व साधु-ये पांच परमेष्ठी देव (अर्थात् परम-उत्कृष्ट पद/स्थिति को प्राप्त होने वाली आत्माएं) माने जाते हैं। इन्हें नवकार महामन्त्र में नमस्कार-वन्दना की गई है (द्र. आवश्यकनियुक्ति गाथा-18, भगवती सूत्र 1/1/1)। वस्तुतः ये पांच आत्माएं आराधना-उपासना की पूर्ण अर्हता रखती हैं। इन पांचों में भी, सर्वाधिक पूज्य -आराधनीय अर्हन्त देव हैं। 'अर्हन्त' नाम की निरुक्ति से भी उनकी आराध्यता रेखांकित होती है (द्र. आवश्यक-नियुक्ति 922, मूलाचार- 55, 564)। इसी तरह, सिद्ध आत्मा का- जो अर्हन्त अवस्था से भी उत्कृष्टस्थिति में होती है- पूज्य, आराध्य होना स्वतःसंगत है।आत्मिक विशुद्धि (वीतरागता) की दृष्टि से आचार्य, उपाध्याय, साधुये तीन आत्माएं भी उच्च स्थिति को प्राप्त होती हैं, अतः इन तीनों को भी वन्दनीय-नमरकरणीय माना जाता है।
जानधर्म दिन म सकि
II 36