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ही आराधना है । आराधक इस आराधना से अपने आराध्य 'परमात्मा' के साथ तादात्म्य स्थापित करने की दिशा में सतत अग्रसर होता है । परमलक्ष्य 'पूर्ण वीतरागता' की प्राप्ति हेतु आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होने वाली आत्माएं सामान्य साधक के लिए प्रकाशस्तम्भ व अनुकरणीय आदर्श होती हैं, इसलिए उन्हें भी श्रद्धास्पद व पूज्य माना गया और वीतरागता के पथिक आचार्य, उपाध्याय, साधु आदि भी परमेष्ठियों के रूप में आराध्य व उपास्य माना गया ।
उपर्युक्त मान्यता का हम अनुशीलन करें तो एकेश्वरवाद व बहुदेववाद - दोनों को समाहित हुआ देखते हैं । एकमात्र वीतराग आत्म-तत्त्व की दृष्टि से एकेश्वर को मान्यता दी गई है तो आत्मबहुत्व एवं पंच परमेष्ठियों व उनकी वैयक्तिक भिन्नता की दृष्टि से बहुदेववाद को मान्य किया गया है।
कालक्रम से, संभवतः वैदिक भक्ति-मार्ग के प्रभाव-वश जैन धर्म व शासन के उपकारी व सहायक होने वाले तीर्थंकर-भक्त स्वर्गस्थ देवों / देवियों को बहुमान दिया जाने लगा और उसकी अभिव्यक्ति उन देवों-देवियों की पूजा आदि के रूप में की जाने लगी । फलस्वरूप, शासन- देवों के रूप में यक्षों, शासन-देवियों के रूप में यक्षिणियों एवं कई अन्य देव - देवियों की अर्चा-पूजा के प्रचुर उदाहरण वर्तमान में प्रत्यक्ष हैं और प्राचीन साहित्य में उपलब्ध होते हैं। उक्त देवों/देवियों की अनेक प्राचीन मूर्तियां भी पुरातत्त्व भण्डार श्रीवृद्धि कर रही हैं । मनीषी ज्ञानियों द्वारा उक्त भक्तिपूर्ण प्रवृत्ति पर प्रश्नचिन्ह उठाया जाता रहा है। उनके अनुसार, उक्त देवों देवियों को बहुमान देना तो विवादास्पद नहीं है, किन्तु उनकी आराधनापूजा-उपासना करना जैन मूल विचारधारा से मेल खाता प्रतीत नहीं होता । प्रायः अनुसन्धाता व तत्त्वज्ञ विद्वान् उक्त प्रवृत्ति को इतर संस्कृति का प्रभाव या अज्ञानजन्य क्रिया मानते हैं ।
जैन धर्म एवं वैदिक धर्म की सास्कृतिक एकता/ 94