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नन्दिरचना विधि का मौलिक अनुसंधान... 25 हालांकि नन्दीरचना के संबंध में प्राचीन जैनागमों में उल्लेख बहुत स्पष्ट नहीं है परन्तु परवर्ती आचार्यों ने इस विषय पर काफी लिखा है। आचार्य हरिभद्रसूरि और आचार्य जिनभद्रसूरि ने अपने ग्रंथों में नन्दीरचना के विविध प्रसंगों पर विचार किए हैं। जिनप्रभसूरि ने अपनी पुस्तक विधमार्गप्रपा में 'नन्दीरचना-विधि' नाम से एक अलग अध्याय लिखकर उस पर विस्तार से चर्चा की है।
जैन धर्म की श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संप्रदाय में इसे सर्वाधिक मान्यता दी गई है। यह एक अनिवार्य अनुष्ठान के रूप में स्वीकृत है, जिसे समवसरण रचना भी कहा जाता है। इसका पालन व्रतधारी की मनोवृत्ति को तदनुरूप बनाने के लिए किया जाता है। सम्यकत्व व्रत, बारहव्रत जैसे व्रतों के ग्रहण के अतिरिक्त अन्य विविध अनुष्ठानों के अवसरों पर भी नन्दिरचना का महत्व है। खासकर उपधान, प्रव्रज्या, उपस्थापना, योगोद्वहन, पदस्थापना के समय इसका निर्माण किया जाता है और मांगलिक मनोभूमि की तैयारी की जाती है। इसके साथ ही साधकों में मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यवज्ञान और केवलज्ञान की साधना में भी नन्दिरचना को सहायक माना जाता है। नन्दीरचना की आवश्यकता क्यों ?
जनसामान्य में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि नन्दिरचना की आवश्यकता कब और क्यों हैं ? इस सम्बन्ध में सूक्ष्मता से विचार करने पर ज्ञात होता है कि नन्दि समवसरण (देवनिर्मित सभामण्डप विशेष, जहाँ तीर्थङ्कर परमात्मा धर्मदेशना देते हैं) की प्रतिकृति रूप रचना है। मान्यता है कि नन्दी के सम्मुख किये जाने वाले व्रतादि अनुष्ठान पूर्णत: फलदायी होते हैं। इसका रहस्य यह है कि तीर्थङ्कर पुरुषों का संसार में चरमोत्कर्ष पुण्य होता है, उनका स्मरण करने मात्र से पवित्र भावनाओं का उद्भव होता है तब अरिहन्त परमात्मा जहाँ साक्षात या प्रतिकृति रूप में विद्यमान हों वहाँ असीम आनन्द की अनुभूति होने में कोई सन्देह हो ही नहीं सकता। इसके अतिरिक्त तीर्थङ्करों के 35 अतिशयों (विशिष्ट गुणों) में एक यह है कि जिस भूमि पर तीर्थङ्कर प्रभु विचरते हैं वहाँ किसी प्रकार का उपद्रव अथवा अमंगल नहीं होता है। इस अपेक्षा से कह सकते हैं कि व्रत आदि स्वीकार की मंगल विधि निर्विघ्नत: सम्पन्न हो एवं गृहीत व्रत आदि में उत्तरोत्तर अभिवृद्धि हो, इस उद्देश्य से नन्दीरचना की परम्परा है।