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उपस्थापना (पंचमहाव्रत आरोपण) विधि का रहस्यमयी अन्वेषण... 239 उपस्थापना की मौलिक विधि उपस्थाप
खरतरगच्छीय विधिमार्गप्रपा192 के निर्देशानुसार सर्वप्रथम श्रेष्ठ योग में समवसरण (नन्दि) की रचना करवायें। तत्पश्चात गुरु उपस्थापना योग्य शिष्य को स्वयं की बायीं ओर बिठाएं। उसके बाद उस शिष्य से मुखवस्त्रिका का प्रतिलेखन करवाकर द्वादशावर्त्तवन्दन दिलवायें। फिर देववन्दन के लिए उपस्थापनाग्राही शिष्य एक खमासमणसूत्र पूर्वक निवेदन करे - 'हे भगवन्! आपकी इच्छा से मुझे पंचमहाव्रत एवं छठा रात्रिभोजनविरमणव्रत का स्वीकार करने के लिए चैत्यवन्दन (देववन्दन) करवायें।' तब गुरु देववन्दन करवाने की स्वीकृति प्रदान करें। तत्पश्चात गुरु शिष्य के उत्तमांग (मस्तक) पर वासचूर्ण का निक्षेपण कर 18 स्तुतियों पूर्वक देववन्दन करवायें। इसमें स्तवन के स्थान पर 'अरिहाणादि स्तोत्र' कहें।
कायोत्सर्ग - उसके बाद गुरु-शिष्य को खमासमण पूर्वक वन्दन करवाकर, पंचमहाव्रतों की प्रतिज्ञा करवाने के लिए सत्ताईस श्वासोच्छ्वास का कायोत्सर्ग करवाकर प्रकट में लोगस्ससूत्र बोलें। फिर समवसरण में विराजित जिनबिम्ब के चरणों में वासचूर्ण डालें।
__पंचमहाव्रत आरोपण - तदनन्तर गुरु तीन बार नमस्कारमन्त्र बोलकर पंचमहाव्रतों एवं छठे रात्रिभोजनविरमणव्रत के दण्डक पाठों (आलापकों) को तीन-तीन बार उच्चरित करवायें अर्थात महाव्रत ग्रहण करवायें। महाव्रत स्वीकार करते समय शिष्य गुरु के बायीं ओर खड़े होकर हाथ की दोनों कोहनियों से चोलपट्ट को दबाकर रखे, बायें हाथ की अनामिका अंगुली से मुखवस्त्रिका को लटकाते हुए ग्रहण करे, दोनों हाथों को गजाग्र दांतों के समान उन्नत कर उससे रजोहरण पकड़कर रखे तथा हृदयशुद्धिपूर्वक नमस्कार मन्त्र का तीन बार स्मरण कर प्रत्येक व्रतालापक को तीन-तीन बार अवधारित करे। तत्पश्चात शुभ लग्न का इष्ट समय आने पर 'इच्चेयाइं पंचमहव्वयाइं राइभोयणवेरमणछट्ठाई अत्तहियट्ठाए उवसंपज्जित्ताणं विहरामि' इतना पाठ गुरु तीन बार कहें और शिष्य उस पाठार्थ को तीन बार ग्रहण करे।
पंचमहाव्रत एवं रात्रिभोजनविरमणव्रत के आलापक निम्न हैं -
अहिंसामहाव्रत - 'पढमे भंते ! महव्वए पाणाइवायाओ वेरमणं सव्वं भंते! पाणाइवायं पच्चक्खामि, से सुहुमं वा बायरं वा तसं वा थावरं वा,