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उपस्थापना (पंचमहाव्रत आरोपण) विधि का रहस्यमयी अन्वेषण... 159 जीवन का निरतिचार पालन करने हेतु इन आगमों का विशिष्टचर्या पूर्वक अभ्यास करवाया जाता है। इस विधि की सर्वोत्तम उपादेयता यह है कि उपस्थापना के पश्चात उपस्थापित शिष्य मुनि जीवन की सर्व क्रियाओं को सामूहिक रूप से सम्पन्न कर सकता है। इससे पूर्व उसकी सब व्यवस्थाएँ पृथक् होती हैं। परमार्थत: इस संस्कार के द्वारा ही नव दीक्षित को मुनि संघ का सदस्य माना जाता है। उपस्थापना का अर्थ एवं उसके एकार्थवाची
उपस्थापना में 'उप' उपसर्ग समीपार्थक और 'स्था' धातु स्थापित करने के अर्थ में है। तदनुसार नूतन दीक्षित को पंचमहाव्रतों में स्थापित करना अथवा मुनि संघ में स्थापित करना उपस्थापना कहा जाता है। ___'उप' का एक अर्थ “विशेष रूप से' ऐसा करें तो उसका तात्पर्य होता है पंचमहाव्रतों में विशेष रूप से, सम्यक् प्रकार से स्थापित करना उपस्थापना है।
_ 'उप' उपसर्ग का दूसरा अर्थ 'उच्च स्थान पर' ऐसा भी है उसके अनुसार सर्वविरति चारित्र जैसे उच्च स्थान पर स्थापित करना उपस्थापना कहलाता है।
प्राकृत-हिन्दी कोश के अनुसार व्रतों का आरोपण करना, दीक्षा देना, व्रतों की स्थापना करना उपस्थापना है।।
जैन आगमों में वर्णित परिभाषा के अनुसार जिसके द्वारा व्रतों का आरोपण किया जाता है, व्रतों की स्थापना की जाती है वह उपस्थापना है। धर्मसंग्रह के अनुसार चारित्र विशेष में स्थापित करना उपस्थापना है। पंचकल्पचूर्णिकार ने व्रतों में स्थापित करने को उपस्थापना कहा है। पंचाशकवृत्ति में भी यही अर्थ समुद्दिष्ट है।
इन अर्थों के अभिप्रायानुसार नूतन मुनि को पंचमहाव्रतों में स्थापित करना उपस्थापना है। __उपस्थापना के लिए छेदोपस्थापनाचारित्र, सर्वविरतिचारित्र, विकलचारित्र, संयम, विरति, बड़ी दीक्षा आदि शब्द भी प्रयुक्त होते हैं। उपस्थापना के प्रकार
उपस्थापना एक प्रकार का चारित्र है। उपस्थापना का अनन्तर काल चारित्र कहलाता है। चारित्र का अर्थ होता है- महाव्रत आदि का आचरण करना अथवा सामायिक साधना करना। चारित्र का एक नाम संयम भी है। संयम के विभिन्न प्रकार हैं -