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134... जैन मुनि के व्रतारोपण की त्रैकालिक उपयोगिता
इच्छं। शिष्य - खमा. इच्छा. संदि भगवन्! सुत्त मण्डली तवं उक्खिवणत्थं करेमि काउसग्गं, अन्नत्थसूत्र कह एक नमस्कारमन्त्र का कायोत्सर्ग करें! पूर्णकर प्रकट में नमस्कारमन्त्र बोलें। शिष्य - खमा इच्छा. संदि. भगवन्! सुत्त मण्डली तवं उक्खिवणत्थं चेइयाई वंदावेह | गुरु - वंदावेमो । शिष्य - इच्छं । शिष्य - वासक्षेप करावेह । गुरु – करावेमो । शिष्य - इच्छं।
शिष्य – तीन नमस्कारमन्त्र गिनते हुए और तीन प्रदक्षिणा देते हुए तीन बार वासचूर्ण ग्रहण करें। फिर गुरु के वचनों का हृदय से अनुकरण करते हुए खमा. इच्छा. संदि. भगवन् चैत्यवंदन करेमि । इच्छं कह बायाँ घुटना ऊँचा करके चैत्यवन्दन के रूप में जंकिंचि०, णमुत्थुणं, जावंति०, खमा०, जावंत., नमोऽर्हत०, उवसग्गहरं, स्तवन, जयवीयराय, अरिहंत चेइयाणं, अन्नत्थ, एक नमस्कारमन्त्र का कायोत्सर्ग कर स्तुति बोलें ।
4. प्रवेदन विधि - यह विधि प्रत्याख्यान ग्रहण करने के उद्देश्य से की जाती है।
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शिष्य – खमा. इच्छा. संदि. भगवन्! पवेयणा मुहपत्ति पडिलेहुं ? गुरु पडिलेहेह । शिष्य - इच्छं । मुखवस्त्रिका का प्रतिलेखन कर दो बार द्वादशावर्त्त वन्दन करें। शिष्य - खमा इच्छा. संदि. भगवन्! पवेयणा पवेंउ ? गुरु - पवेयह। शिष्य - इच्छं। शिष्य - खमा इच्छा. संदि. भगवन्! तुम्हे अम्हं श्री सुत्त मण्डली तवं उक्खिवणत्थं पाली तप करशुं ? गुरु - करेह । शिष्य - इच्छं। शिष्य – खमा. संदि. भगवन्! पसायकरी पच्चक्खाण करावोजी । गुरु आयंबिल का प्रत्याख्यान करावें ।
5. स्वाध्याय विधि - यह विधि स्वाध्याय एवं आहार आदि के विषय में उपयोग रखने से सम्बन्धित है। इस क्रिया के द्वारा स्वाध्याय करने और भिक्षाटन करने की अनुज्ञा ली जाती है ।
शिष्य – सर्वप्रथम खमा. इच्छा. संदि. भगवन्! सज्झाय संदिसाहुं ? गुरु- संदिसावेह | शिष्य - इच्छं । शिष्य खमा. इच्छा. संदि. भगवन्! सज्झाय करूं? गुरु - करेह । शिष्य - इच्छं । गुरु- एक नमस्कारमन्त्र पूर्वक ‘धम्मोमंगल' की पाँच गाथाएँ बोलें। फिर पुनः एक नमस्कारमन्त्र कहें। शिष्य - खमा. इच्छा. संदि. भगवन् ! उपयोग संदिसाहुं ? गुरु - संदिसावेह । शिष्य इच्छं । शिष्य – खमा. इच्छा. संदि. भगवन्! उपयोग करूँ ? गुरु - करेह ।
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