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126... जैन मुनि के व्रतारोपण की त्रैकालिक उपयोगिता
3. भोजन मण्डली 4. काल मण्डली 5. आवश्यक मण्डली 6. स्वाध्याय मण्डली और 7. संस्तारक मण्डली ।
1. सूत्र मण्डली श्रमण या श्रमणी समूह के साथ बैठकर शास्त्र ग्रन्थों का अभ्यास करना, सूत्रों का स्मरण करना, सूत्रों का पुनरावर्तन करना सूत्र मण्डली है।
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2. अर्थ मण्डली
श्रमण या श्रमणी समुदाय के साथ बैठकर सूत्रों के पुनरावर्तन करना अर्थ मण्डली है।
अर्थ का अध्ययन करना या 3. भोजन मण्डली श्रमण या श्रमणी समूह के साथ बैठकर भोजन करना, एक-दूसरे में परस्पर आदान-प्रदान करना, संघाटक (समूह) के रूप में भिक्षागमन करना इस तरह आहार विषयक क्रियाओं को सम्मिलित रूप से करना भोजन मण्डली है।
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4. काल मण्डली - श्रमण या श्रमणी समूह के साथ नियत काल में किये जाने वाले आवश्यक अनुष्ठान जैसे- प्रतिलेखना, प्रमार्जना, उग्घाड़ा पौरुषी, बहुपडिपुन्ना पौरुषी, चौबीस माण्डला इत्यादि क्रियाकलाप सम्पन्न करना काल मण्डली है।
5. आवश्यक मण्डली श्रमण या श्रमणी समूह के साथ बैठकर प्रतिक्रमण, वन्दन, कायोत्सर्ग आदि करना आवश्यक मण्डली है। यहाँ आवश्यक का तात्पर्य सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव वन्दन, प्रतिक्रमण, कायोत्सर्ग और प्रत्याख्यान रूप षडावश्यक से है।
6. स्वाध्याय मण्डली उत्कालिक, आगाढ़-अनागाढ़, अंग- उपांगादि सूत्रों की वाचना ग्रहण करना, स्वाध्याय के पाँच प्रकारों का अभ्यास करना या उनका प्रयोग करना स्वाध्याय मण्डली है।
7. संस्तारक मण्डली श्रमण या श्रमणी समूह के समीप आसन लगाना, संस्तारक बिछाना, बैठना या सोना संस्तारक मण्डली है।
यह ध्यातव्य है कि जिन परम्पराओं में यह तप विधि प्रचलित है उनमें सात मण्डली के योग (तप) करवाने के पश्चात ही नवदीक्षित मुनि को समूह में सम्मिलित करते हैं। इस मण्डली के योग में सात दिन आयम्बिल करवाये जाते हैं। इस तपो विधान को करवाते हुए जिस मण्डली का तप पूर्ण होता है मुनि को उस मण्डली में प्रवेश दे दिया जाता है। इस प्रकार सात मण्डली के योग पूर्ण होने तक वह श्रमण समुदाय की समस्त क्रियाओं को युगपद् रूप से
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