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122...जैन मुनि के व्रतारोपण की त्रैकालिक उपयोगिता नव्य युग के.....
36. वही, 3/181 37. वही, 3/182 38. वही, 3/183 39. (क) छव्वरिसो पव्वइयो। भगवतीटीका, 5-3
(ख) अन्तकृद्दशासूत्र, 6/18 40. अन्तकृद्दशासूत्र, संपा. मधुकरमुनि, वर्ग 3, अ. 8 41. बाल दीक्षा समर्थन विशेषांक (सन्मार्ग). सन् 2008, नवम्बर 42. भण्णइ खुड्डगभावो, कम्मखओवसमभावपभवेणं। चरणेणं किं विरूज्झइ ? जेणम जोग्गत्ति सग्गाहो।।
पंचवस्तुक, गा. 57-60 43. आवश्यकचूर्णि, भा. 2, पृ. 202-03 44. निशीथभाष्य, गा. 3556 45. वही, गा. 3556 46. वही, गा. 3560 47. बृहत्कल्पभाष्य, गा.1139-42 48. पंचाशकप्रकरण, अनु. दीनानाथ शर्मा, 2/25 49. वही, 2/26 50. वही, 2/27 51. विधिमार्गप्रपा सानुवाद, पृ. 97 52. (क) भगवतीसूत्र, 14/9
(ख) पंचवस्तुक, गा. 200-201 53. पंचाशकप्रकरण, 2/38-44 54. जैन आचार सिद्धान्त और स्वरूप, पृ.448 55. उच्छुवणे सालिवणे, पउमसरे कुसुमिए व वणसंडे गंभीरसाणुणाए, पयाहिणजले जिणहरे वा।।
विशेषावश्यकभाष्य, गा. 3404 56. मिगसरअद्दा पुस्से, तिन्नि य पुव्वाइं मूलमस्से सा।
हत्थो चित्ता य तहा, दस विद्धिकराई णाणस्स।। (क) स्थानांगसूत्र, 10/170 (ख) समवायांगसूत्र, संपा. मधुकरमुनि, 10/65 (ग) विशेषावश्यकभाष्य, गा. 3408 (घ) गणिविद्या, गा.23, 27, 29, 41