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प्रव्रज्या विधि की शास्त्रीय विचारणा... 91
का वस्त्र विशेष ), 17. रजस्त्राण, 18. तिरपनी बन्धन, 19. पात्र बन्धन, 20. पूंजणी (पात्रादि प्रतिलेखन का साधन ), 21. दो चद्दर, 22. दो चोलपट्ट (अधोभागी वस्त्र), 23. कम्बली, 24. कंदोरा, 25. कमरबन्धन, 26. पुस्तकबन्धन, 27. संथारा (एक प्रकार का ऊनी वस्त्र, जो शयन करते समय बिछाया जाता है), 28. उत्तरपट्टा (एक प्रकार का सूती वस्त्र, यह संथारा के ऊपर बिछाया जाता है), 29. सुपड़ी (काजा लेने का साधन), 30. जपमाला, 31. ठवणी (पुस्तक रखने का साधन), 32. आवश्यक क्रिया की पुस्तकें, 33. ऊनी आसन। श्वेताम्बर मान्यतानुसार मुनि दीक्षा के लिए उपर्युक्त उपकरण आवश्यक होते हैं।
दीक्षार्थी साध्वी के उपकरण
जैन धर्म की मूर्तिपूजक परम्परा में श्राविका की दीक्षा हो, तो निम्नलिखित उपकरण आवश्यक हैं- 70
1. रजोहरण, 2. निशीथिया, 3. ऊन का ओघेरिया, 4. रजोहरण का डोरा, 5. चन्दन की चोरस दण्डी, 6. मुखवस्त्रिका, 7. दण्डा, 8. दण्डासन, 9. पात्र की जोड़, 10. तिरपनी 11. काचली, 12. तिरपनी की डोरी, 13. जलग्रहण पात्र (घड़ा), 14. जलपात्र की डोरी, 15. पाँच पड़ला, 16. रजस्त्राण, 17. दो पात्र प्रोञ्छनक वस्त्र, 18. गरणा (जल छानने का वस्त्र), 19. तिरपनी बन्धन, 20. पात्र बन्धन (गुच्छा), 21. पूंजणी, 22. संथारा, 23. आसन, 24. उत्तरपट्टा, 25. पुस्तक बन्धन, 26. रजोहरण बन्धन, 27. सुपड़ी (काजा एकत्रित करने का साधन ), 28. ठवणी, 29. कंदोरा, 30. कमरपट्टा, 31. दो जांघिया, 32. तीन साड़ा (अधोभागीय वस्त्र), 33. दो कंचुई (ऊर्ध्वभागीय वस्त्र), 34. तीन चद्दर, 35. जपमाला आदि । दीक्षा (संन्यास) अवधारणा की ऐतिहासिक विकास-यात्रा
दीक्षा, आध्यात्मिक साधना की विशिष्ट पद्धति है । वैराग्यवासित आत्माएँ इस पथ को अंगीकार करती हैं। गृहस्थ जीवन का त्याग कर संन्यास मार्ग को अपनाना दीक्षा व्रत कहलाता है। किसी व्यक्ति को श्रमण संस्था में प्रविष्टि पाने हेतु दीक्षा व्रत स्वीकार करना आवश्यक है। इस व्रत के माध्यम से सुनिश्चित होता है कि यह व्यक्ति गृहवास का त्याग कर, पारिवारिक रिश्ते-नातों का बन्धन तोड़ चुका है. सांसारिक मोह माया से विरक्त होकर परमात्म तत्त्व की