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प्रव्रज्या विधि की शास्त्रीय विचारणा... 51 परमानन्द की प्राप्ति रूप है, वहाँ साधन भी आनन्ददायक होना चाहिए। जैसे कोई पुरुष जाना चाहता है बम्बई और प्रस्थान करता है मद्रास की गाड़ी से, तो वह अपने गन्तव्य तक नहीं पहुँच सकता। उसी प्रकार जो भव्य प्राणी जड़-चेतन का भेद समझकर, आत्मा के साथ संलग्न कर्म-पुद्गलों के आवरण को हटाकर, अपने आत्मदेव से साक्षात्कार करने का परमाभिलाषी बनता है, उसके लिए दीक्षा रूपी साधन ही सर्वश्रेष्ठ है।
प्रश्न सामने आता है कि क्या संसार में रहकर व्यक्ति साधना नहीं कर सकता ? प्रश्न सहज है लेकिन जरा चिन्तन करिये कि जो सांसारिक व्यामोह में फंसे हुए हैं, अपने पारिवारिक बन्धनों में जकड़े हुए हैं, वे अपने जीवन का कितना समय साधना या प्रभु-स्मरण में व्यतीत करते हैं? उनको प्रभु-भजन के लिए समय ही नहीं मिलता। प्रभु-स्मरण की बात तो जाने दीजिए। उनको अपने आपके विषय में सोचने का भी समय नहीं मिलता। अत: संसार में रहकर साधना कैसे सम्भव है ? इस पर कई लोग कहते हैं कि हम गृहस्थ में रहकर अपने बाल-बच्चों का पालन-पोषण करते हैं। अपने माता-पिता की सेवा करते हैं। भोजनादि देकर कर्त्तव्य-पालन करते हैं। यह सब संयम से बढ़कर है। संयमजीवन में आप किसका पालन-पोषण कर रहे हो ? या कौनसा बड़ा दायित्व निभा रहे हो ? अतएव संयम से तो गृहस्थ-जीवन ज्यादा श्रेष्ठ है।
भ्रान्त लोगों का यह कथन निरा-मिथ्या है। गृहस्थ में रहकर अपने बालबच्चों का पालन-पोषण तो पशु-पक्षी भी करते हैं, तो मानव उसका पालन करे, इसमें कोई महानता या बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं है। माता-पिता आदि पारिवारिक सदस्यों की अर्थ से सेवा करना सर्वोपरि सेवा नहीं है। यदि आप माता-पिता की मन, वचन या शरीर से सेवा करना चाहते हैं तो आपको भी इसी मार्ग का आश्रय लेना पड़ेगा। यदि आप माता-पिता की सच्चे मन से सेवा करते हैं तो उनके कल्याणार्थ आपको उन्हें न्याय-नीति और मर्यादा परिपूर्ण धर्म मार्ग में स्थापित करना होगा। यदि वचन से माता-पिता की सेवा करना चाहते हैं तो उनके हित के लिए सत्य-तथ्य प्रामाणिक वचनों का उच्चारण करना होगा। यदि शरीर से उनकी सेवा करना चाहते हैं तो उनके लिए अपने शरीर का भी सुखत्याग कर धर्म मार्ग को अपनाना होगा। अत: आप केवल अर्थ से माता-पिता की शुद्ध परिपूर्ण सेवा नहीं कर सकते।