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________________ Gc ४ थावरिया डाकोत ज्यूं, बोले अनेक विध कूर। इह लोक तणो अर्थी घणो, बलि माने आपणपो सूर॥ ५ कनै रहे तिण साधू तणो, वैर बुद्धि ज्यूं जाण । खीटोर खोराई करै घणी, पग-पग ताणां ताण ।। 'कुह्या कानां री कूतरी, तिण रै झरै कीड़ा राध लोही। सगळे ठांम सूं काढ़े हुड-हुड करी, घर में आवण न दे कोइ। ध्रिग घ्रिग अवनीत आत्मा ॥धुपदं ।। २ कुती बिगाड़े रमणीक आंगणो, न्हाखे कीड़ा राध लोही। वास दुरगंध आवै अति बुरी, तिण नै धुर-धुर करै सर्व कोई।। जेहवी कुह्या कानां री कुतरी, तेहवा अवनीत नै अभिमानी। तिण रो पाड़वो सील नै मुख अरी, तिण सूं सगळा इ दे जाए कांनी॥ ४ अवनीत रा मुख मां सूं नीककै, ते तो कुवचन कीड़ा सम जांणो। रमणीक आंगणा ज्यूं सुध साध नै, पाप लगावै क्रोध उठांणो॥ थिरकरण माहे राखे तेहनो, छिद्रग्रहे है द्रोही। तिण नै कुह्या कानां री कुतरी ज्यूं, गण बारे कादै सर्व कोइ। कण सहित कुंडो छोड़ नै, भिष्टो भखे भंडसूर। तिण भंडसूरा री ओपमा, अवनीत नै दीधी वीर।। ते अविनो छै भिष्टा सारिखो, तिण नै अवनीत आचर लीधो। विनै धर्म सूं अळगो पड्यो, अनंत संसार आरै कीधो॥ तिण भंडसूरा नै मृग री, ते ओपमा अवनीत नै छाजे। तिण रो बिगड्यो इहलोक नै परलोक, तो ही निरलज मूळ न लाजे॥ अवनीत नै अवनीत मिल्या, अवनीतपणो सीखावे। पछै बुटकनां नै बळद ज्यूं दोनूं जणा दुःख पावै॥ १० कुशिष रो चेलापणो, जेहवो वेस्या रो घरवास। खिण - खिण आय विनो करे, खिण-खिण हुवै उदास ।। ११ ते वेस्या मुतळब आप रे, करै सोले सिणगार। पुरुष रिझावै पारका, ते किण री म जांणो नार।। १२ ज्यूं अवनीत बाह्य विनो करै, ते तो मुतळब रो छै यारो। जो स्वार्थ देखे असीजतो, तो खिण माहे होय जाये न्यारो॥ १३ वेस्या सूं ग्रहवासो करे, तके धन खूटां पछै पिछतावै। ज्यूं अवनीत नै कनै राखियां, ते तो काम पड्या सीदावै।। १. लय : सल्य कोइ मत राख जो। २७६ तेरापंथ : मर्यादा और व्यवस्था
SR No.006153
Book TitleTerapanth Maryada Aur Vyavastha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya, Madhukarmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2004
Total Pages498
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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