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________________ ( २२ ) एम सहू को जग कारिमो जी, को नही राखणहार ॥ साचो एक संसारमेंजी, जिनधर्म एक याधार रे ॥ ॥ ११ ॥ जी० ॥ टोडीने धन्याशरीजी, नवमी ढालें राग ॥ समय सुंदर कहे सांनलो जी, जिम उपजे वैराग रे ॥ १२ ॥ जी० ॥ ॥ ढाल दशमी ॥ राग धन्याश्री ॥ चंदन नगरी दीपती ॥ ए देशी ॥ ॥ एम वृषनें प्रतिबूजीउ, वजी कीधो मस्तकें लो च ॥ राज ऋधि तृण जिम परिहरी, यति नलो ए खालोच ॥ ० ॥ १ ॥ मुनिवर वादीयें ॥ करकं साधु सुसाधु रे, पेहलो प्रत्येक बुद्ध ॥ मु०॥ ए यांकणी ॥ तत्काल उधो मुहपत्ती, देवता दीधो वेश ॥ वैराग संयम यादस्यो, पांगुखो तुरत प्रदेश || पांगु ॥ २ ॥ ॥ मुनि० ॥ करकंमुनां केतां कहुं, एकजीने गुण वखाण ॥ एकता च्यारे थायशे, ए खंम चनये जाण ॥ ए ॥ ३ ॥ मुनि० ॥ गम्बवडा खरतर गुरु वडा, जिल चंद युगह प्रधान ॥ जिण सिंहसूरि सुजरा घणो, जसु वि यो अकबर मान ॥ जसु० ॥ ४॥ मुनि० ॥ खागरें श्राव क दीपता, श्रीमाली ने उशवाल || विमल नाथ प्र सादथी, व्यति सुखी चतुर खुशाल ॥ ० ॥ ५ ॥ मु० ॥ Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.005374
Book TitleKarkanduadik Char Pratyek Buddhno Ras
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Bhimsinh Manek
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year
Total Pages104
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size7 MB
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