________________ 260 दशाश्रुतस्कन्धसूत्रम् अष्टमी दशा हत्थुत्तराहिं गब्भाओ गभं साहरिए / / 2 / / हत्युत्तराहिं जाए / / 3 / / हत्थुत्तराहिं मुंडे भवित्ता आगाराओ अणगारियं पव्वइए / / 4 / / हत्थुत्तराहिं अणंते अणुत्तरे निव्वाघाए निरावरणे कसिणे पडिपुण्णे केवल-वरनाण-दसणे समुप्पण्णे / / 5 / / साइणा परिनिव्वुए भगवं जाव भुज्जो उवदंसेति त्ति बेमि / / इति पज्जोसणं नाम अट्ठमी दसा समत्ता / तस्मिन् काले तस्मिन् समये श्रमणस्य भगवतो महावीरस्य पञ्च हस्तोत्तरा अभूवन् / तद्यथा-हस्तोत्तरे च्युतश्च्युत्वा गर्भेऽवक्रान्तः ||1|| हस्तोत्तरे गर्भाद् गर्भ संहृतः / 2 / / हस्तोत्तरे जातः / / 3 / / हस्तोत्तरे मुण्डो भूत्वा आगारादनगारितां प्रव्रजितः / / 4 / / हस्तोत्तरेऽनन्तमनुत्तरं निर्व्याघातं निरावरणं कृत्स्नं प्रतिपूर्णं केवल-वरज्ञान-दर्शनं समुत्पन्नम् / / 5 / / . स्वातिना परिनिवृत्ते भगवान् यावद् भूय उपदर्शयति, इति ब्रवीमि / इति पर्युषणा नामाष्टमी दशा समाप्ता / पदार्थान्वयः-तेणं कालेणं-उस काल और तेणं समएणं-उस समय समणे-श्रमण भगवं-भगवान् महावीरे-महावीर स्वामी के पंच हत्थुत्तरा होत्था-पांच कल्याणक उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में हुए / तं जहा-जैसे हत्युत्तराहिं चुए-उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में देवलोक से च्युत हुए फिर चइत्ता-च्युत होकर गब्भं वक्फते-गर्भ में उत्पन्न हुए हत्थुत्तराहि-उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में गब्भाओ-गर्भ से गर्भ-गर्भ में साहरिए-संहरण किये गए हत्युत्तराहिं जाए-उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में उत्पन्न हुए हत्थुत्तराहि-उत्तराफाल्गुनी में मुंडे भवित्ता-मुण्डित होकर आगाराओ-घर से अणगारियं-साधु-वृत्ति में पव्वइए-प्रव्रजित हुए अर्थात् साधु-वृत्ति ग्रहण की हत्युत्तराहि- उत्तराफाल्गुनी में अणंते-अनन्त अणुत्तरे--प्रधान निव्वाघाए-निर्व्याघात निरावरणे-निरावरण कसिणे-सम्पूर्ण पडिपुण्णं-प्रतिपूर्ण वर-प्रधान केवलनाणे-केवल ज्ञान दंसणे-केवल दर्शन समुप्पण्णे-समुत्पन्न हुआ / भगवं-भगवान् साइणा-स्वाति नक्षत्र में परिनिव्वुए-मोक्ष को प्राप्त हुए जाव-यावत् भुज्जो-पुनः-२