________________ सप्तमी दशा हिन्दीभाषाटीकासहितम् / - 241 जाय तो यह क्रम आठवीं, नौवीं आदि प्रतिमाओं में भी मानना पड़ेगा और इस क्रम से बारहवीं प्रतिमा का समय पूरा बारह मास होगा / वृत्तिकार भी इस विषय में इसी प्रकार लिखते हैं / जैसे: “सप्तमासिक्यां प्रतिमायां समाप्तिं नीतायां वर्षावास-योग्यं क्षेत्र प्रतिलेखयति / वर्षावासयोग्यमुपधिं चोत्पादयति / स च नियमाद्गच्छति, प्रतिबद्धो भवति / सर्वा अप्येता अष्टभिर्मासैः समाप्यन्ते / तिसृणां प्रतिमानां प्रतिक्रमणा प्रतिपादना चैकस्मिन्नेव वर्षे भवति, षड्भिर्मासैः परिक्रमणा षड्भिरेव प्रतिपत्तिरिति कृत्वा / यावत्प्रमाणा (प्रतिमाता ?) तावत्प्रमाणैव परिक्रमणावगन्तव्या / मासिक्यां मासं यावत्परिक्रमणा / एवं सप्तमासिक्यां सप्तमासं यावत्परिक्रमणेति भावः / यावता कालेन परिक्रमणा भवति तावान्परिक्रमण-कालः | तिसृणामुपरि वर्तमानानां चतुर्थ्यादिप्रति-मानामन्यस्मिन्वर्षे परिक्रमणान्यस्मिन्वर्षे च प्रतिपत्तिरिति / शोभनेषु. द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावेषु वर्तमानेषु प्रतिमाः प्रतिपद्यन्ते / तिस्रः सप्त-रात्रिं-दिवाः प्रतिमाः / एवमेक-विंशतिरात्रिंदिवा परिक्रमिता तावद्भिरेव प्रतिमा परिसमाप्ताश्च भवन्ति / एतावताऽष्टमी-नवमी-दशम्यः प्रतिमाः एकविंशतितमे दिवसे परिपूरिता भवन्ति / एकादशी त्रिभिरहोरात्रैः समाप्यतेऽन्त्येन षष्ठेन समं द्वादशी एकरात्रिं-दिवा / अत्र रात्रिंदिव-शब्देन केवला रात्रिरेव ग्राह्या, अन्यथा एक-रात्रिकीति सूत्रेण विरोधात् / चतुर्भि-रहोरात्रैरन्त्याष्टेन निष्ठिता भवति / " अर्थ स्पष्ट कर दिया गया | प्रतिमा-धारी मुनि मानसिक और शारीरिक बल से परिपूर्ण होता है और इसीलिए इन प्रतिमाओं का सम्यक्तया पालन कर सकता है / इस प्रकार शारीरिक कष्टों को सहन कर वह आत्मिक-बल प्राप्त करता है / यह उसके लिए श्रेय है, क्योंकि संसार के सब बलों मे आत्मिक-बल ही सबसे बढ़कर है / इससे सम्यग्-दर्शन-रूप बल प्राप्त कर वह सम्यक्-चारित्र की आराधना भली भांति कर सकता है / अब सूत्रकार प्रतिमाओं के आवश्यक कर्तव्यों का वर्णन करते हुए कहते हैं:____ मासियं णं भिक्खु-पडिमं पडिवन्नस्स अणगारस्स निच्चं वोसट्टकाए चियत्तदेहे जे केइ उवसग्गा उववज्जंति, तं जहा-दिव्वा वा माणुसा वा तिरिक्ख-जोणिया वा, तं उप्पण्णे सम्मं सहति, खमति, तितिक्खति, अहियासेति /