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________________ कायम्, बाह्यं वाऽपि पुद्गलम्, न फूत्कुर्यात्, न व्यजेत्; अन्येन न फूत्कारयेत्, न व्याजयेत्; अन्यं फूत्कुर्वन्तं वा, व्यजन्तं वा न समनुजानीयात्; यावजीवं त्रिविधं त्रिविधेन , मनसा, वाचा, कायेन; न करोमि, न कारयामि, कुर्वन्तमप्यन्यं न समनुजानामि। तस्य भदन्त! प्रतिक्रामामि, निन्दामि, गर्हे , आत्मानं व्युत्सृजामि॥४॥ [सूत्र // 17 // ] पदार्थान्वयः-से-वह भिक्खू वा-साधु अथवा भिक्खुणी वा-साध्वी जो कि संजय-निरन्तर यत्नशील है विरय-नाना प्रकार के तप-कर्मों में रत है पडिहय-प्रतिहत है पच्चक्खायपावकम्मे-पाप-कर्म को छोड़ चुका है दिआ वा-दिन में, अथवा राओ वा-रात्रि में अथवा एगओवा-अकेले हो अथवा परिसागओवा-परिषद् में बैठा हुआ हो अथवा सुत्ते वासोया हुआ हो अथवा जागरमाणे वा-जागता हुआ हो से-वह सिएण वा-श्वेत चमर से अथवा विहुयणेण वा-पंखे से अथवा तालिअंटेण वा-ताड़-वृक्ष के पंखे से, अथवा पत्तेण वा-पत्तों से, अथवा पत्तभंगेण वा-पत्तों के टुकड़ों से, अथवा साहाए वा-शाखा से, अथवा साहाभंगेण वा-शाखाओं के टकडों से अथवा पिहणेण वा-मयर के पंखों से, अथवा पिहणहत्थेण वामयूरादि की पिच्छी से, अथवा चेलेण वा-वस्त्र से, अथवा चेलकण्णेण वा-वस्त्र के टुकड़ों से, अथवा हत्थेण वा-हाथ से, अथवा मुहेण वा-मुख से अप्पण्णो वा कायं-अपने शरीर को अथवा बाहिरं वा वि पुग्गलं-शरीर से बाहर के पुद्गलों को न फुमिज्जा-फूंक मारे नहीं न वीएज्जा-पंखादि से बयार करे नहीं अन्नं-अन्य से न फुमाविज्जा-फूंक लगवाए नहीं न वीयाविज्जा-पंखादि से बयार करवाए नहीं और फुमंतं वा-फूंक लगाते हुए अथवा वीअंतं वापंखादि से बयार करते हुए अन्नं-अन्य किसी व्यक्ति की न समणुजाणिज्जा-अनुमोदन करे नहीं जावज्जीवाए-जीवन पर्यन्त तिविहं-त्रिविध तिविहेणं-त्रिविध से मणेणं-मन से वायाएवचन से काएणं-काय से न करेमि-न करूँ न कारवेमि-न कराउँ करंतंपि-करते हुए भी अन्नं-औरों की न समणुजाणामि-अनुमोदना न करूँ भंते-हे भगवन् ! तस्स-उसका पडिक्कमामि-मैं प्रतिक्रमण करता हूँ निंदामि-निंदा करता हूँ गरिहामि-गर्हणा करता हूँ अप्पाणंआत्मा को वोसिरामि-हटाता हूँ। मूलार्थ-पूर्वोक्त पाँच महाव्रत-सहित वह भिक्षु अथवा भिक्षुणी, जो कि संयत है, विरत है, प्रतिहत है और पापकर्म से रहित है। दिन में, रात्रि में , अकेलेदुकेले, सोते-जागते; श्वेत चमर से, पंखे से, ताड़-वृक्ष के पके से, पत्ते से, पत्तों के टुकड़ों से, शाखा से, शाखाओं के टुकड़ों से, मयूरपिच्छी से, मयूरपिच्छी की पूँजनी से,वस्त्र सें, वस्त्र के टुकड़े से, हाथ से, मुख से; अपने शरीर को वा बाहर के पुद्गल को, न फूंक लगाए, न पंखा करे; अन्य से न फूंक लगवाए, न पंखा करवाए और न फूंक लगाते हुए या पँखा करते हुए अन्य किसी व्यक्ति की अनुमोदना न करे; जीवनपर्यन्त त्रिविध-कृत-कारित-अनुमोदना से तथा त्रियोग-मन-वचन-काय से[ इसके अनन्तर शिष्य प्रतिज्ञा करता है कि ] हे भगवन् ! अग्नि-काय का आरम्भ न मैं स्वयं करूँ, न कराऊँ और न करते हुए अन्य किसी व्यक्ति की अनुमोदना ही करूँ और जो 70] दशवैकालिकसूत्रम् [ चतुर्थाध्ययनम्
SR No.004497
Book TitleDashvaikalaik Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAatmaramji Maharaj, Shivmuni
PublisherAatm Gyan Shraman Shiv Agam Prakashan Samiti
Publication Year2003
Total Pages560
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_dashvaikalik
File Size12 MB
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