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________________ है ) के द्वारा। अप्पाणं-अपने आप को। झुसित्ता-आराधित कर। सटुिं-साठ। भत्ताई-भक्तों-भोजनों / का। अणसणाए-अनशन द्वारा। छेदित्ता-छेदन कर। आलोइयपडिक्कन्ते-आलोचितप्रतिक्रान्त अर्थात् आलोचना और प्रतिक्रमण को कर के। समाहि-समाधि को। पत्ते-प्राप्त हुआ। कालमासे-कालमास में। कालं किच्चा-काल करके। सोहम्मे-सौधर्म। कप्पे-देवलोक में। देवत्ताए-देवरूप से। उववन्नेउत्पन्न हुआ। से णं-वह / तओ-उस। देवलोगाओ-देवलोक से। आउक्खएणं-आयु के क्षय होने से। भवक्खएणं-भव के क्षय होने से। ठिइक्खएणं-और स्थिति का क्षय होने से। अणंतरं-अन्तररहित। चयं-देवशरीर को। चइत्ता-छोड़ कर / माणुस्सं-मनुष्य के। विग्गह-शरीर को। लभिहिइ-प्राप्त करेगा। लभिहित्ता-प्राप्त करके, वहां। केवलं-निर्मल-शंका, आकांक्षा आदि दोषों से रहित। बोहि-सम्यक्त्व को। बुझिहिइ-प्राप्त करेगा। बुझिहित्ता-प्राप्त करके। तहारूवाणं-तथारूप। थेराणं-स्थविरों के। अंतिए-पास। मुंडे-मुण्डित होकर। जाव-यावत् अर्थात् साधुधर्म में। पन्वइस्सइ-प्रव्रजित-दीक्षित हो जाएगा। सेणं-वह। तत्थ-वहां पर। बहूई-अनेक / वासाइं-वर्षों तक।सामण्णं-संयमव्रत को। पाउणिहिइपालन करेगा। आलोइयपडिक्कन्ते-आलोचना और प्रतिक्रमण कर। समाहिं पत्ते-समाधि को प्राप्त .. हुआ। कालगए-काल करके। सणंकुमारे-सनत्कुमार नामक। कप्पे-तीसरे देवलोक में। देवत्ताएदेवतारूप से। उववजिहिइ-उत्पन्न होगा। तओ-वहां से। माणुस्सं-मनुष्य भव प्राप्त करेगा, वहां से। महासुक्के-महाशुक्र नामक देवलोक में उत्पन्न होगा, वहां से च्यव कर। माणुस्सं-मनुष्य भव में जन्मेगा, वहां से मर कर। आणए-आनत नामक नवम देवलोक में उत्पन्न होगा, वहां से। माणुस्सं-मनुष्यभव में जन्म लेगा, वहां से। आरणे-आरण नाम के एकादशवें देवलोक में उत्पन्न होगा। वहां से। माणुस्सं-मनुष्य भव में जन्मेगा और वहां से। सव्वट्ठसिद्धे-सर्वार्थसिद्ध में उत्पन्न होगा। से. णं-वह। तओ-वहां से। अणंतरं-व्यवधानरहित। उव्वट्टित्ता-निकल कर। महाविदेहे-महाविदेहे क्षेत्र में उत्पन्न होगा। जावयावत् / अड्ढाइं-आढ्य कुल में। जहा-जैसे। दढपइण्णे-दृढ़प्रतिज्ञ। सिज्झिहिइ ५-सिद्ध पद को प्राप्त करेगा, 5 / तं-सो। एवं-इस प्रकार / खलु-निश्चय ही। जंबू!-हे जम्बू ! समणेणं-श्रमण। जाव-यावत् / संपत्तेणं-संप्राप्त ने। सुहविवागाणं-सुख-विपाक के। पढमस्स-प्रथम। अज्झयणस्स-अध्ययन का। अयमद्वे-यह अर्थ। पण्णत्ते-प्रतिपादन किया है। त्ति-इस प्रकार। बेमि-मैं कहता हूँ।,पढम-प्रथम। अज्झयणं-अध्ययन। समत्तं-सम्पूर्ण हुआ। मूलार्थ-तदनन्तर वह सुबाहु अणगार श्रमण भगवान् महावीर स्वामी के तथारूप स्थविरों के पास सामायिक आदि एकादश अंगों का अध्ययन करने लगा, तथा उपवास आदि अनेक प्रकार के तपों के अनुष्ठान से आत्मा को भावित करता हुआ, बहुत वर्षों तक श्रामण्यपर्याय का यथाविधि पालन कर के एक मास की संलेखना से अपने 1. आलोचना-शब्द प्रायश्चित के लिए अपने दोषों को गुरुओं को बतलाना-इस अर्थ का परिचायक है, और प्रमादवश शुभ योग से गिर कर अशुभ योग प्राप्त करने के अनन्तर फिर से शुभयोग को प्राप्त करने तथा साधु और श्रावक के प्रातः सायं करने के एक आवश्यक अनुष्ठानविशेष की प्रतिक्रमण संज्ञा है। ___2. तथारूप तथा स्थविर पदों की व्याख्या प्रथम श्रुतस्कंधीय प्रथमाध्याय में की जा चुकी है। . 940 ] श्री विपाक सूत्रम् / प्रथम अध्याय [द्वितीय श्रुतस्कन्ध
SR No.004496
Book TitleVipak Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyanmuni, Shivmuni
PublisherAatm Gyan Shraman Shiv Agam Prakashan Samiti
Publication Year2004
Total Pages1034
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size21 MB
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