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________________ चाप्यभवत् / जाता जाता दारकाः विनिघातमापद्यन्ते। ततः स गोत्रासः कूटग्राहो द्वितीयातः पृथिवीतोऽनन्तरमुवृत्य इहैव वाणिजग्रामे नगरे विजयमित्रस्य सार्थवाहस्य सुभद्राया भार्यायाः कुक्षौ पुत्रतयोपपन्नः। ततः सा सुभद्रा सार्थवाही अन्यदा कदाचित् नवसु मासेषु बहुपरिपूर्णेषु दारकं प्रजाता। ततः सा सुभद्रा सार्थवाही तं दारकं जातमात्रमेव एकान्ते अशुचिराशौ उज्झयति, उज्झयित्वा द्विरपि ग्राहयति ग्राहयित्वाऽऽनुपूर्येण संरक्षन्ती संगोपयन्ती संवर्द्धयति। ततस्तस्य दारकस्याम्बापितरौ स्थितिपतितां च चन्द्रसूर्यदर्शनं च जागर्यां च महता ऋद्धिसत्कारसमुदयेन कुरुतः। ततस्तस्य दारकस्य अम्बापितरौ एकादशे दिवसे निवृते सम्प्राप्ते द्वादशाहनीदमेतद्पं गौणं गुणनिष्पन्नं नामधेयं कुरुतः। यस्माद् आवाभ्यामयं दारको जातमात्रक एवैकान्तेऽशुचिराशौ उज्झितः, तस्माद् भवत्वावयोर्दारक उज्झितको नाम्ना। ततः स उज्झितको दारकः पञ्चधात्रीपरिगृहीतः तद्यथा-क्षीरधात्र्या, मज्जन मण्डन क्रीडापन० अंकधात्र्या यथा दृढ़प्रतिज्ञो यावत् निर्वातनिर्व्याघातगिरिकन्दरमालीन इव चम्पकपादपः सुखसुखेन परिवर्धते।। पदार्थ-तते णं-क्दनन्तर। विजयमित्तस्स-विजयमित्र नामक। सत्थवाहस्स-सार्थवाह की। सुभद्दा-सुभद्रा नामक। सा-वह। भारिया-भार्या / जातनिंदुया-जातनिंदुका-जिसके बच्चे उत्पन्न होते ही मर जाते हों। यावि होत्था-थी। जाया जाया दारगा-उसके उत्पन्न होते ही बालक। विनिहायमावजंतिविनाश को प्राप्त हो जाते थे। तते णं-तदनन्तर / से गोत्तासे-वह गोत्रास / दोच्चाए-दूसरे। पुढवीओनरक से। अणंतरं-अन्तर रहित। उव्वट्टित्ता-निकल कर / इहेव-इसी।वाणियग्गामे-वाणिजग्राम नामक। णगरे-नगर में। विजयमित्तस्स-विजयमित्र। सत्थवाहस्स-सार्थवाह की। सुभद्दाए भारियाए-सुभद्रा भार्या की। कुच्छिंसि-कुक्षि में। पुत्तत्ताए-पुत्र रूप से। उववन्ने-उत्पन्न हुआ। तते णं-तदनन्तर। सा सुभद्दा-उस सुभद्रा / सत्थवाही-सार्थवाही ने। अन्नया कयाइ-किसी अन्य समय में / नवण्हं मासाणं-. नव मास के। बहुपडिपुण्णाणं-परिपूर्ण होने पर। दारगं-बालक को। पयाया-जन्म दिया। तते णंतदनन्तर / सा सुभद्दा-उस सुभद्रा / सत्थवाही-सार्थवाही। जातमेत्तयं चेव-जातमात्र ही-उत्पन्न होते ही। तं दारगं-उस बालक को। एगंते-एकान्त। उक्कुरुडियाए-कूड़े कर्कट के ढेर पर। उज्झावेति-डलवा देती है। दोच्चं पि-द्वितीय बार पुनः। गेण्हावेति-ग्रहण करा लेती है अर्थात् वहां से उठवा लेती है और। आणुपुव्वेणं-क्रमशः। सारक्खमाणी-संरक्षण करती हुई। संगोवेमाणी- संगोपन करती हुई। संवड्ढेतिवृद्धि को प्राप्त कराती है। तते णं-तदनन्तर। तस्स-उस। दारगस्स-बालक के। अम्मापियरो-मातापिता। ठितिपडियं च-स्थिति पतित-कुलमर्यादा के अनुसार पुत्र-जन्मोचित बधाई बांटने आदि की पुत्रजन्म-क्रिया तथा तीसरे दिन। चंदसूरदसणं च-चन्द्रसूर्य दर्शन अर्थात् तत्सम्बन्धी उत्सव विशेष। जागरियं च- (छठे दिन) जागरणमहोत्सव। महया-महान / इड्ढिसक्कारसमुदएणं-ऋद्धि और सत्कार प्रथम श्रुतस्कंध] श्री विपाक सूत्रम् / द्वितीय अध्याय [289
SR No.004496
Book TitleVipak Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyanmuni, Shivmuni
PublisherAatm Gyan Shraman Shiv Agam Prakashan Samiti
Publication Year2004
Total Pages1034
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size21 MB
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