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________________ मूलार्थ-उस मृगाग्राम नामक नगर में एक जन्मान्ध पुरुष रहता था, आंखों वाला एक मनुष्य उस की लकड़ी पकड़े रहा करता था, उस लकड़ी के सहारे वह चला करता था, उस के सिर के बाल अत्यन्त बिखरे हुए थे, अत्यन्त मलिन होने के कारण उस के पीछे मक्खिओं के झुण्डों के झुण्ड लगे रहते थे, ऐसा वह जन्मान्ध पुरुष मृगाग्राम के प्रत्येक घर में भिक्षावृत्ति से अपनी आजीविका चला रहा था। उस काल तथा उस समय में श्रमण भगवान् महावीर स्वामी नगर के बाहर चन्दनपादप उद्यान में पधारे।[उन के पधारने का समाचार मिलते ही ] उनके दर्शनार्थ जनता नगर से चल पड़ी। तदनन्तर विजय नामक क्षत्रिय राजा भी महाराज कूणिक की तरह भगवान् के चरणों में उपस्थित हो कर उन की पर्युपासना-सेवा करने लगा। नगर के कोलाहलमय वातावरण को जान कर वह जन्मान्ध पुरुष, उस पुरुष के प्रति इस प्रकार बोला-हे देवानुप्रिय ! (हे भद्र !) क्या आज मृगाग्राम में इन्द्रमहोत्सव है जिस के कारण जनता नगर से बाहर जा रही है ? उस पुरुष ने कहा-हे देवानुप्रिय! आज नगर में इन्द्रमहोत्सव नहीं, किन्तु [बाहर चन्दनपादप नामा उद्यान में ] श्रमण भगवान् महावीर स्वामी पधारे हैं, वहां यह जनता उनके दर्शनार्थ जा रही है। तब उस अन्धे पुरुष ने कहा-चलो हम भी चलें, चलकर भगवान् की पर्युपासना-सेवा करेंगे। तदनन्तर दण्ड के द्वारा आगे को ले जाया जाता हुआ वह पुरुष जहां पर श्रमण भगवान् महावीर विराजमान थे वहां पर आ गया, आकर उस ! जन्मान्ध पुरुष ने भगवान् को तीन बार दाहिनी ओर से आरम्भ करके प्रदक्षिणा की। प्रदक्षिणा कर के वन्दना और नमस्कार किया, तत्पश्चात् वह भगवान् की पर्युपासनासेवा में तत्पर हुआ।तदनन्तर श्रमण भगवान् महावीर ने विजय राजा और परिषद्-जनता को धर्मोपदेश दिया। भगवान् की कथा को सुनकर राजा विजय तथा परिषद् चली गई। उस काल और उस समय में श्रमण भगवान् महावीर स्वामी के प्रधान शिष्य इन्द्रभूति नाम के अनगार [ गौतम गणधर ] भी वहां विराजमान थे। भगवान् गौतम स्वामी ने अन्धे पुरुष को देखा, देखकर श्रमण भगवान् महावीर स्वामी से निवेदन किया-क्या भदन्त ! कोई ऐसा पुरुष भी है कि जो जन्मान्ध तथा जन्मान्धरूप हो ? भगवान् ने फरमाया-हां, गौतम ! है। गौतम स्वामी ने पुनः पूछा -हे भदन्त ! वह पुरुष कहां है जो जन्मान्ध (जिस के नेत्रों का आकार तो है परन्तु उस में देखने की शक्ति न हो) और जन्मान्धरूप (जिस के शरीर में नेत्रों का आकार भी नहीं बन पाया, अत्यन्त कुरूप) है ? टीका-प्रस्तुत सूत्र में एक जन्मान्ध व्यक्ति के जीवन का परिचय कराया गया है। 1. वचन से स्तुति करना वन्दना है, काया से प्रणाम करना नमस्कार कहलाता है। प्रथम श्रुतस्कंध ] श्री विपाक सूत्रम् / प्रथम अध्याय [127
SR No.004496
Book TitleVipak Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyanmuni, Shivmuni
PublisherAatm Gyan Shraman Shiv Agam Prakashan Samiti
Publication Year2004
Total Pages1034
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size21 MB
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