________________ कम / 120 अभिज्ञानशाकुन्तलम् [द्वितीयोसेनापतिः-यथाऽऽज्ञापयति स्वामी। विदषकः-भो उच्छाअहेतुअ ! णिक्कम-णिक्कम / [ भोः ! उत्साहहेतुक ! निष्क्राम-निष्काम ] / (सेनापतिः-निष्क्रान्तः ) / राजा-(परिजनानवलोक्य-) मृगयावेषमपनयन्तु भवन्तः / रैवतक ! त्वमपि स्वनियोगमशून्यं कुरु / रैवतकः-जं महराओ आणवेदि / (-इति निष्क्रान्तः)। [यन्महाराज आज्ञापयति ( -इति निष्क्रान्तः ) / ] विदषकः-किदं भअदा णिम्मक्खिों / ता इमस्सि पादवच्छाआ. विरइदविदाण-सणाहे सिलाअले उवविसदु भवं, जाव अहम्पि सुहासीनो होमि। स्पर्शा अपि, जडाअपि च सूर्यकान्तमणयोऽभिभवाद्यथा दहन्ति, तथैव प्रायः शान्तान्यपि तपोवनानि पराभवाद्दहन्त्येवेति दृष्टान्तालङ्कारः / काव्यलिङ्गं केचिदाहुः॥७॥ निष्काम = अपगच्छ / परिजनान् = भृत्यान् / मृगयानुकुलो वेषो-मृगयावेषः = सन्नाहः, तम्। अपनयन्तु = त्यजन्तु। स्वस्य नियोग-स्वनियोग = स्वाधिकारं, द्वारपालनम् / अशून्यम् = अरिक्तं / स्वकार्यमाचर तावत् / इतो बहिहैं। अतः ये तपोवन (आश्रम वासी मुनिगण) भी राजा या अन्य किसी के द्वारा अभिभूत होने से उसे जलाकर राख ( उसका विनाश ) ही कर देते हैं // 7 // सेनापति-जैसी महाराज की आज्ञा / विदूषक-अरे झूठा उत्साह दिलाने आले ! जा, निकल, यहाँ से शीघ्र निकल / [ सेनापति-जाता है ] / राजा-(अपने मुसाहबों की ओर देखकर ) आप लोग भी जाकर अपना 2 मृगयावेष दूर करिए ( जाकर कमर खोलिए)। रैवतक ! तुम भी अपने कामपर जाओ / ( अर्थात्-दर्वाजे पर जाकर बैठो / आवश्यकता होने पर बुलालेंगे ) / रैवतक-जैसी महाराज की आज्ञा / ( जाता है)। विदूषक-आपने अब निर्मक्षिक (इन सबको हटाकर मानों मक्खियों से शून्य,